रविवार, 28 अगस्त 2011

इस मुकाम पर...

आज तेरहवें दिन अन्ना हजारे अपना अनशन तोड़ेंगे और यह पूरा मुहिम एक मुकाम तक पहूंचेगा जो निश्चय ही इस अभियान की परीणति नहीं है. अन्ना ने खुद कहा है कि यह आधी जीत है. मैं इसे बड़ी लड़ाई का एक हिस्सा मानता हूं. वैसी लड़ाई जिसमें लोकतंत्र का मतलब यह ना रहे कि वोट देने के बाद मतदाता अपने छोटे मोटे काम के लिये जूझता रहे। एक ऐसी व्यवस्था हो जिसमें आखिरी आदमी भी अपनी नागरिकता को संपूर्णता में जी सके. इस लिये जो लोग इस पुरे आंदोलन को अ-राजनीतिक मानते रहें हैं वह इस भूलावे में ना रहे. क्योंकि यह वह जमाना है जिसमें शायद ही कुछ ऐसा हो जो राजनीति से बाहर हो. सत्ता और संसाधन पर कब्जा जमाने की होड़ में जनता इससे पहले कि किनारे हो जाये उसे अपनी अहमियत पता चल जानी चाहिये जो संभवतः इस आंदोलन की बड़ी सफलता होगी.
ये ठीक है कि अन्ना हजारे का यह आंदोलन एक उद्देश्य, प्रभावी भ्रष्टाचार उन्मुलन के विधेयक के लिये था लेकिन इसको मिलने वाला व्यापक समर्थन केवल इसलिये नहीं था. सरकारी नीतियों के आड़ में पीसते जनता को अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति देने का यह माध्यम बन गया. इसीलिये निरंतर इसके साथ जनसमर्थन जुड़ता चला गया, बावजुद इसके कि इसकी आलोचना भी साथ साथ होती रही. वैसे आलोचक कम निंदक या विरोधी अधिक थे. लेकिन एरोगेंसी और अकड़ के तमाम आरोपो के बावजुद जैसा लचीलापन इस ‘टीम अन्ना’ ने दिखाया वह दुर्लभ है. इसके आलोचक भी स्वीकारेंगे कि अप्रैल में इस टीम ने जो लोकपाल पेश किया था उसे यह कितना बदल चुकी थी और लगातार मंच से कह रही थी कि आपत्ति दर्ज कराने पर हर संभव बदलाव/सुधार हो सकता है. इसी मुद्दे पर सरकार को भी कन्विंस करने कि कोशिश चलती रही.
एक बड़ा आरोप इस पर यह था कि इस टीम में सभी जाति, वर्ग, समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं है या यह आंदोलन एक खास वर्गीय चरित्र वाला है. पता नहीं आलोचको के पास कौन से मशीन है उपस्थित जन समुदाय का डी.एन.ए. जांच  इतना आसानी से कर ले रहा है. फिर भी इस बार कम से कम टेलीविजन पर आने वाले चेहरों को देखिए तो लगेगा कि इस दल के ऊपरी स्तर में भी विविधता थी. खास बात यह कि इस आंदोलन का नेतृत्व ही एक पिछड़ी जाति के हाथ में था. लगातार बढ़ते समर्थन ने भी इस बात को पुख्ता कर दिया कि यह केवल मध्यवर्गीय आंदोलन नहीं है. जिस रात मैं रामलीला मैदान गया था, वहां पर जो जनता उपस्थित थी उनका अधिकांश निम्न वर्ग से था और दिल़चस्प बात यह कि कुछ मुसलमान युवक पानी बांट रहे थे और साथ कुछ हिंदु युवक कृष्णाष्टमी का प्रसाद.
कुछ लोगों की त्योरियां इस बात पर भी चढी कि इस आंदोलन में ‘भारत माता की जय’ या ‘वंदे मातरम’ का नारा एक खास धार्मिक चरित्र लिये है. प्रशांत भूषण ने अलबत्ता ये कहा कि किसी खास संगठन द्वारा लगाये जाने से नारा उनकी संपत्ति नहीं हो जाती. वैसे सबसे बडी बात यह कि क्या यह नारा लगता था तो सचमुच किसी धार्मिक समुदाय की चेतना से वशीभूत हो कर और वह चेतना अगले ही क्षण ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ के नारे से सेकुलर हो जाती है.   नारा सचमुच विद्वेष फैला रहा है या उसके प्रभाव की गलत व्याख्या हो रही है. मस्जिद में अजान गुंजने से यह बात साबित नहीं हो जाती कि यह ‘अजान’ अन्य धर्मों के विरुद्ध है. अतः इस पुर्वग्रह से  निकल जाने की जरूरत है.
एक बड़ी आपत्ति यह रही कि यह आंदोलन संविधान के विरूद्ध है और चुंकि संविधान के विरुद्ध है इसलिये बहुजन समाज के भी विरुद्ध है. देर सबेर यह बात सुश्री मायावती को समझ में आ  गई और पहले समर्थन के बाद उन्होंने अंततः समर्थन वापस ले लिया. मैं लाख माथा पच्ची के बाद भी यह समझ नहीं पाया की संविधान में प्रदत्त  नागरिक अधिकारों को और प्रभावी बनाने के लिये चला यह  आंदोलन संविधान विरोधी कैसे है ? क्या इसलिये कि इसका नेतृत्व कुछ अगड़ी जाति के हाथ में था. वैसे ये लोग अपनी इस ‘अस्मिता’ जो उन पर थोपी जा रही थी के प्रति  कितना सचेत थे? तो क्या हर आंदोलन का विरोध इसलिये कर देना चाहिये कि उसका नेतृत्व किसी जाति विशेष के हाथ में है.  वहीं नेतृत्व बदलते ही इसका चरित्र बदल जाता ?   
आंदोलन के शुरूआत में ही सांसदो ने इस बात पर चिंता जताई कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हनन है और संसद सबसे सर्वोच्च संस्था है. वस्तुतः सदन में बैठे सांसद अब तक इस बात के आदि थे कि चुन लिये जाने के बाद वे अपनी मनमानी अगले पांच साल तक कर सकते हैं. और जनता को जो करना होगा वह चुनाव में करेगी. आश्चर्य है कि जिस लोहिया ने यह कहा था कि ‘जिंदा  कौमें पांच साल तक इंतज़ार नहीं करती’ उसी लोहिया के ‘शिष्य’ इस जन उभार से अधिक व्यथित थे. बहस के आखिरी दिन उन्हें याद आ गया होगा कि लोकतंत्र में सर्वोच्च सत्ता जनता है और कोई भी संस्था उसके बाद . संविधान की प्रस्तावना भी  ‘ हम भारत के लोग’ पंक्ति से शुरु होती है. सांसदों के बाद यह पाठ अगर नौकरशाही भी पढ़ ले  तो लोकतंत्र का भला हो जाये. प्रभावी लोकपाल बिल के आने से ऐसी उम्मीद की जा सकती है. क्योंकि नौकरशाही से ही जनता का पाला अधिक पड़ता है . जो संभवतः सबसे अधिक भ्रष्ट है.
इस वर्ष विश्व में ऐसी बहुत सी परिघटनायें हो रहीं है जिसमें जनता सत्ता के विरोध में उठ खड़ी हुई है. कहीं वह सत्ता बदल चुकी है तो कहीं संघर्ष जारी है. भारत में यह प्रयोग इसलीये अनूठा है क्योंकि एक बार फिर यह अंहिसा के अस्त्रों से संपन्ना हुआ है. तेरह दिन तक चलने वाले इस आंदोलन में हिंसा की एक भी घटना नहीं मिली। जीत के जश्न को भी शालीनता पूर्वक मनाने का आग्रह मंच से किया गया .(ये अलग बात है कि कुछ लंपट भी थे लेकिन नेतृत्व ने पुलिस से उचित कार्रवाई करने को कहा). बिना नेतृत्व के विभिन्न शहरों में कायम रहने वाला अनुशासन प्रशंसनीय और उम्मीद भरा है.
सच में यह उम्मीद भरा समय है और इसका जश्न मनाने की बजाय सोचना चाहिये कि अब आगे किन मुद्दों पर आंदोलन को बढ़ाया जाय. बहुत से मोर्चो पर लोग पहले से सक्रिय हैं उनके संघर्ष से भी कंधा मिलाने की जरूरत है. गांधी जी भी सत्याग्रह के बाद रचनात्मक सत्याग्रह की बात कहते थे मुझे लगता है कि अब यह समय निश्चय ही रचनात्मक सत्याग्रह का है ताकि यह दौर स्थायी रह सके।   

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

रामनाथ का जीवन चरित्र- हबीब तनवीर


इस कविता को पढ़ते हुए रघुवीर सहाय की कविता रामदास की याद आती है. परन्तु  हबीब साहब की इस कविता की जमीन वहीं लेकिन विवरण अलग है. यह कविता १९६२ में लिखी गई थी. रघुवीर सहाय की रामदास कविता जो ‘हंसो हंसो जल्दी हंसो’ संग्रह  में थी का रचना काल १९७०-७५ है. पेश है हबीब तनवीर की कविता…

रामनाथ का जीवन चरित्र

रामनाथ ने जीवन में कपड़े पहने कुल छः सौ गज़
पगड़ी पांच
जुते पन्द्रह
रामनाथ ने अपने जीवन में सौ मन चावल खाया
सब्जी दस मन
फ़ाके किये अनगिनत
शराब दो सौ बोतल
पूजा की दो हजार बार
रामनाथ ने अपने जीवन में धरती नापी कुल जुमला पैंसठ हजार मील

सोया पंद्रह साल
प्यार की रातें उसे मिलीं दो ढाई हजार
उसके जीवन में आईं बीबी के सिवा कुल पांच औरतें
एक के साथ पचास की उम्र में प्यार किया और प्यार किया नौ साल

सत्तर फ़ीट कटवाये बाल
स्त्रह फ़ीट नाख़ून
रुपया कमाया दस हजार या ग्यारह
कुछ रुपया मित्रों को दिया कुछ मंदिर को
और छोड़ा आठ रुपये और उन्नीस नये पैसे का कर्ज
बस यह गिनती रामनाथ का जीवन है
इसमें शामिल नहीं चिता की लकड़ी, तेल, कफ़न
तेरही का भोजन
रामनाथ बहुत हंसमुख था उसने पाया एक संतुष्ट सुखी जीवन
चोरी कभी न की
कभी कभार अलबत्ता कह देता बीबी से झूठ
गाली दी, दो तीन महीने में एक-आध
एक च्युंटी भी नहीं मारी
बच्चे छोड़े सात।
भूल चुके हैं गांव के सबलोग उसकी हर बात
रामनाथ!   (हबीब तनवीर-एक रंग व्यक्तित्व में संकलित)

रविवार, 24 जुलाई 2011

कुत्ते,बच्चे और चिल्लर पार्टी


हमारे मोहल्ले में वैसे बहुत से कुत्ते थे लेकिन एक खास कुत्ता था जो रोज रात को हमारे घर आता था और पापा उसके लिये रोटी रखते थे. इसी तरह गांव में भी हर टोले में अलग अलग कुत्ते रहते थे और उन कुत्तो को एक दूसरे के इलाके में प्रवेश नागवार गुजरता था. हर घर से इन कुत्तो को खाने को कुछ मिल जाता था. किसी के आने का या किसी खतरे का पहला संकेत ये कुत्ते ही देते थे. इनके भौंकने की तीव्रता से ही स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता था. रात में कभी कभार ये  अजीब आवाज में रोते थे इससे डर भी लगता था. बताया जाता है कि अदुनियावी शै जो मनुष्य नहीं देख पाते हैं कुत्ते देख लेते हैं और भय से रोते हैं. खैर, मुझे लगता है कि मनुष्य ने अपनी यात्रा के प्रांरभ में जिन पशुओं से दोस्ती की होगी उसमें कुत्ता जरूर पहला रहा होगा. महाभारत में  युद्धिष्ठिर का साथ कोई भी उसके संबंधी नहीं निभा सके लेकिन कुता सशरीर स्वर्ग तक उनके साथ गया. आज कल भी पालतू जन्तु के रूप में कुत्ते सबसे ज्यादा पाले जाते हैं. गांव में तो गाय बकरी रखने वाले लोग कुत्तों को इसलिये रख लेते थे कि वह चोर और अन्य किसी प्रकार के खतरे से उन मवेशियों कि रक्षा कर सकता था या सूचना दे सकता था.
मैं कुत्तो को इतना याद क्यों कर रहा हूं? इसका कारण है चिल्लर पार्टी. चिल्लर पार्टी में फ़टका का एक मात्र साथी उसका कुत्ता भिड़ु है. भिड़ु को मंत्री भीड़े अपनी अहम का शिकार बनाना चाहता है. और फ़टका जो अनाथ बच्चा है उसके एक मात्र दोस्त को छीन लेना चाहता है. इसके लिये वह भिड़ु को आवारा घोषीत करता है. जबकि भिड़ु आवारा कुत्ता नहीं. वैसे आवारा कुत्ता होता क्या है? यह एक नितांत शहरी अवधारणा है. अलग बात है कि भिड़ु की नस्ल हाई फ़ाई नहीं है. लेकिन भिड़ु ने मंत्री के सचिव पर भौंक दिया है. सिकुड़ते जा रहे शक्ति और अहम को उपर उठाने के लिये मंत्री इस कुत्ते को माध्यम बना लेता है. लेकिन चिल्लर पार्टी फ़टका और भिड़ु के साथ खड़ी है क्योंकि उसने पढा है कि सही के साथ अवश्य खड़ा होना चाहिये, अपना किया हुआ वादा अवश्य निभाना चाहिये., दोस्त के साथ अंत तक दोस्ती रखनी चाहिये. दूसरे बड़े बच्चों की तरह यह बच्चे अपनी पढाई भूले नहीं है. फ़टका का यह वाक्य अंदर तक असर करता है. सच में, अगर अपनी पढाई को याद रखें उन तमाम नैतिक शिक्षाओं को जो स्कूल में सिखाया जाता है, तो क्या दुनिया इतनी अन्याय पूर्ण होगी?
फ़िल्म में एक संवाद है कि ‘यह दुनिया भिड़ु की भी है’. सच में, ये दुनिया केवल मनुष्यों की नहीं है. जानवरों  और असंख्य जीवधारियों के साथ उस पर्यावरण की भी है जो हमेशा मानव के साथ रहा है और मानवों  ने हमेशा इनका दोहन किया है. एक आधुनिक सुविधापूर्ण, विकसित समाज बनाने के नाम पर इस दुनिया से भिड़ु जैसे कई जानवरों को बाहर कर देने कि निरंतर साजिश चल रही है.
चिल्लर पार्टी इस दौर में आई एक उम्दा फ़िल्म है. जिसे भले ही बच्चों की फ़िल्म कह कर प्रचारित कर लिया जाये लेकिन यह फ़िल्म बच्चों से ज्यादा बड़ों की है. क्योंकि बच्चों को अपने साथी का नामकरण करने के लिये हिंदू नाम नहीं खोजना पड़ता, ये तो उस बच्चे के पापा को ही याद रहता है. क्योंकि बच्चे ही किसी चीज के साथ निस्पृह भाव से खड़े हो सकते हैं और यह जल्दी जान सकते हैं कि किसी को परेशान करना कितना नाजायज है.
चिल्लर पार्टी पर कोई भी बात बच्चों के अभिनय की तारीफ किये बगैर नहीं पूरी हो सकती. खास कर जांघिया, पनौती, एन्साइक्लोपीडीया, फटका ने तो कमाल किया है. निर्देशक अपनी   सूझ बुझ से कुत्ते के चेहरे पर भी अभिनय के भाव लेने में सक्षम हुआ है.
एक सवाल फटका जैसे तमाम बच्चों की तरफ से यह फ़िल्म उठाती है कि अगर ये बच्चे श्रम ना करें तो खायें कहां से ? क्या सरकार और गैर सरकारी संगठन इस जिम्मेदारी को उठाने के लिये तैयार हैं ? राजेश जोशी की पंक्ति का याद आ जाना स्वाभाविक है ‘बच्चे काम पर जा रहें है’. लेकिन बच्चे काम पर ना जायें तो खायें क्या ? काम पर उनके शोषण से बचाने और उनका बचपन लौटाने के क्या विकल्प हैं हमारे पास. यह जटिल सवाल है इसका हल खोजा जाना चाहिये.