शनिवार, 8 जनवरी 2011

भाषा, ज्ञान और वर्चस्व

स्मृति का यह अनुभव यथार्थ है जो हमारे देश के उच्च शिक्षा के परिसरों में फ़ैला है. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें न जाने कितने वर्षों से उच्च शिक्षा के आकांक्षी विद्यार्थियों के स्वप्न टूट रहे हैं. इसके विरोध में उठी कोई भी आवाज़ नक्कारखाने की तुती है. ये आवाज़ भी सही...

भाषा  अभिव्यक्ति और ज्ञान  की अभिव्यक्ति का एक मूलभूत माध्यम है यह एक मान्य अवधारणा है. या युं कहें कि एक स्वीकृत सत्य है. परन्तु चार्ल्स टेलर के शब्दों मे इससे भी बड़ा सत्य है कि भाषा ज्ञान का निर्माण भी करती है. भाषा सत्य की सरंचना में भी अहम भूमिका निभाती है. ज्ञान और सत्य का रिश्ता जगजाहिर है.
खैर, मेरा उद्देश्य भाषा से जुड़े इन प्रश्नों पर आपका ध्यान दिलाने का नहीं है. मेरी रुचि केवल यह बताने में है कि भाषा  ज्ञान  के निर्माण से जुड़ी है. फ़ुको के शब्दों में ज्ञान  शक्ति के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है. अतः भाषा और शक्ति का भी सीधा संबंध है.
यहां मैं भाषा और शक्ति के संबंध को इस बड़े विवादित प्रश्न से नहीं वरन अपने शैक्षणिक अनुभवों से जोड़ने का प्रयास कर रही हूं. बिहार से इंटरमिडियेट की शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्याल में राजनीति विज्ञान  विषय में दाखिला लिया. विषय को ठीक से समझने और उसे व्यक्त करने के कारण और अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण मैंने हिन्दी को माध्यम के रूप में चुना, तब तक मैं इस बात से अनजान थी कि भाषा की भूमिका अभिव्यक्त की सुविधा ही सिर्फ़ नहीं है.
प्रथम वर्ष में हिन्दी की पुस्तकों पर आश्रित रहने के बाद दूसरे वर्ष में मैंने अंग्रेजी की भी पुस्तकों का उपयोग किया. तीसरे वर्ष में मैंने सिर्फ़ अंग्रेजी की पुस्तकों का सहारा लिया लेकिन परीक्षा में रीमिक्स यानी हिंग्लिश का प्रयोग किया. मेरा नतिज़ा पिछले दो वर्षों से बेहतर था. यह किस्सा इसलिये नहीं बताया कि अंग्रेजी के प्रयोग ने मेरे अंक को बढ़ा दिया. बल्कि इसलिये कि मेरी समझ में धीरे धीरे आना शुरु हो गया था कि हिन्दी को माध्यम के रूप में उपयोग करने वाले के लिये राजनीति विज्ञान  उतना स्पेस नहीं दे सकता. स्नातकोत्तर का प्रथम वर्ष मेरे तीन सालों से भी अधिक संघर्षपूर्ण रहा. विषय की सभी शाखाओं के रीडिंग पैकेज अंग्रेजी में थे और मेरे जैसे बहुत से छात्रों को यह मान कर चलना था कि हमें इसी माध्यम में चीजों को पढना होगा बेहतर अंक और समझ के लिये. यहां से नयी जद्दोजहद शुरु हुई. पहले रीडींग को पढना, पहले पाठ में केवल अंग्रेजी के जटील शब्दों के अर्थ को जानना, दुसरे में अर्थ को संदर्भ में समझने की कोशिश करना, तीसरे में यह समझना की रीडींग किन पहलुओं को उजागर कर रहा है और चौथे में निहितार्थ समझना. अब सोचिये कि जिस पाठ को अंग्रेजी माध्यम के छात्र एक बार में समझ सकते थे उसे हमें चार बार में समझना पड़ता था. और यह समझ भी संतोषजनक नहीं थी क्योंकि अपरिचित भाषा से प्राप्त  ज्ञान  कितना सुदृढ़ होगा ?
प्रथम सेमेस्टर में हिन्दी माध्यम के अधिकांश छात्र फ़ेल हुए, विवशता में अंग्रेजी को अपना माध्यम बनाये छात्रों में से एक मेरी भी स्थिति अच्छी नहीं थी. दूसरे से चौथे सेमेस्टर तक हिन्दी माध्यम के अधिकांश विद्यार्थी या तो इस विषय को छोड़ चुके थे या किसी तरह संघर्षरत थे, पचपन प्रतिशत बनाने के लिये क्योंकि एम.फ़िल. प्रवेश की यह न्युनतम अहर्ता होती है. अब उनका संघर्ष विषय को समझने का नहीं बल्कि अध्ययन को जारी रखने का था.
 यह पूरा दोष भाषा का नहीं है. परंतु यह प्रश्न तो है कि क्या अधिकांश हिन्दी माध्यम के छात्र कमजोर थे. वे प्रतिभाशाली नही थे या उनकी असफ़लता का कारण भाषा भी थी. भाषा का यह भेद भाव नया नहीं है. मेरा क्षोभ इस बात का है कि दिल्ली विश्वविद्यालय या कुछ बड़े केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान का अध्ययन केन्द्र हर प्रकार के भेद भाव का अध्ययन करती है चाहे वह जाति का हो लिंग का हो धर्म का हो या समुदाय का हो मगर भाषा के क्षेत्र में जो यहां होता है या पुरे एकेडेमिक क्षेत्र में होता है, उनकी बात क्यों नहीं करते? शायद यह उपेक्षा इसलिये भी है क्योंकि भाषा की तानाशाही कायम रखी जा सके ताकि एक विशेष प्रकार के ग्यान का उत्पादन हो सके जो इनके वर्चस्व को कायम रखने में मदद करे.
मेरा वास्ता उन छात्रों के दर्द से है जिसमें भारत के सुदुर हिस्से से आनेवाले छात्र उच्च शिक्षा हासिल का सपना लिये हजारों मिल दूर आते हैं. परन्तु उनका स्वप्न भाषा की तानाशाही तले कुचल जाता है, इन सपनों के टूटने की जिम्मेवारी कौन लेगा. क्या वे एक अजनबी भाषा के अनुकूल अपने को बनाये या उससे पराजित होकर शस्त्र रख दे. दुनिया की ज्ञान परम्परा गवाह है कि एक अज़नबी भाषा में मौलिक ज्ञान का निर्माण नहीं सो सकता. उसमें तो नकल ही हो सकती है जिसमें हम माहिर हैं. लेकिन एक प्रश्न अंग्रेजी भाषा के साम्राज्यवादियों सी भी है कि क्या वे इन अध्ययन केन्द्रों को समावेशी बनायेंगे ताकि ज्ञान का निर्बाध प्रवाह नीचे तक हो

4 टिप्‍पणियां:

Rahul Singh ने कहा…

अगरेजी की समृद्धि और हिन्‍दी की सीमाएं, न चाह कर भी स्‍वीकार करनी पड़ती है और समझौते भी.आशा जरूर की जा सकती है कि समय के साथ कोई और राह बनेगी. इसलिए फिलहाल इसे एक अन्‍य/अधिक भाषा सीख लेने जैसा मानना ही श्रेयस्‍कर है.

amitesh ने कहा…

अंग्रेजी की समृद्धि के से इनकार नहीं, पर इस समृद्धि के पिछे सत्ता है. उसे समृद्ध बनाया गया है. हिन्दी के पीछे भी सत्ता होती और सदिच्छा होती तो वो भी एक समृद्ध भाषा होती. यह होने का जिसमें माद्दा है.

मुन्ना के पांडेय(कुणाल) ने कहा…

मेरे साथ का एक वाक्य है,मेरे हास्टल में सभी लोग अपने नवागत होने पर परम्परानुसार स्टेज पर जाके अपने स्कूली और आर्थिक दबंगई यानि मैं दून का हूँ,मैं सेंत पाल से आया हूँ.मैं सनावर का हूँ मैं लवडेल का हूँ,मैं दिल्ली पब्लिक स्कूल का हूँ -का प्रदर्शन कर रहे थे उसी में एक लड़के ने माईक पर जाकर कहा मैं सेंत बोरिस से आया हूँ,कई लोग भौंचक हुए यह कौन सा स्कूल है?पर उस लड़के ने तब कोई जवाब नहीं दिया बाद में मैंने पूछा तो उसका जवाब बहुत चौंकाऊ नहीं था,उसने कहा-सब लोगों का चेपी बहुत भयानक था मेरा बाप की हैसियत इतनी नहीं थी मैंने मिडिल स्कूल तक की शिक्षा अपने कांख में जूट का बोरा दबा कर बिछा कर उसपर बैठकर पूरी की है इसलिए मैंने झल्लाहट में सेंत बोरिस कह दिया.क्या करता?-

आप उस जैसे छात्रों को सोचिये.अंग्रेजी पावर और सत्ता की भाषा बनी हुई है और इसके जादुई प्रभाव से इनकार नहीं है पर स्मृति जी की चिंता अंग्रेजी हटाओ मुहीम की नहीं है ना उनके लेखन से ऐसा लगा है.दरअसल यह लेखन हमारा ध्यान उस चिंता की ओर खींचता है जहां हमारी शिक्षा पद्धति मेकाले के अंग्रेजीछाप से आज तक निपट नहीं सकी है या उसे अपने परिवेश और भाषा के अनुसार नहीं ढली है.ज्ञान की भाषा यदि अंग्रेजी है तो उसे हमारे हिंदी यह किसी भी अन्य भाषा में भी रूपांतरण किया जाये या उसी भाषा में दिया जाये यह संभव नहीं?यह बहुत आसान है कि अंग्रेजी के आतंक से कम से कम शिक्षा तंत्र तो मुक्त हो,मेरा यह कथन क्लासरुमीय व्यवस्था के लिए है.और जहाँ तक एक और भाषा सीखने की बात है तो उसकी शुरुआत प्राईमरी लेवल से हो,पर यह संभव है क्या ऐसा विल पावर हमारी व्यवस्था में तो नहीं दिख रहा तब शिक्षकों का भी फ़र्ज़ तो कुछ बनता है.बिना नींव के इमारत नहीं कड़ी होती यह लेका उसी नींव को ज़माने की बात कर रहा है मेरे ख्याल से.पर उससे पहले जिन छात्रों का बैकग्राउंड अंग्रेजीदां नहीं उनको जबरदस्ती इस गड्ढे में खींचना कहाँ तक जायज़ है.५५% की चिंता में घुल रहा छात्र अपना भविष्य अंग्रेजी न जानने की वजह से डूबता देखेगा कि भाषा सीखने लिखने की ललक दिखायेगा,यह बहुत दुखद है पर हमारे अधिकाँश शिक्षक सोशल साईंस के हिंदी बोलना लिखना तो पाप ही समझते है और उनकी मार खाते हैं वे जिनकी ट्रेनिंग उनकी तरह की नहीं है.फिर यह भी कि चीन जापान फ़्रांस या जर्मनी ने apni जबान को ज्ञान का माध्यम नहीं बनाया क्या ?या अंग्रेजी बिन सब सून है ?इस लेख को कम से कम मैं तो इसी लिहाज़ से एक बेहतरीन प्रश्न-दस्तावेज़ समझता हूँ.कब हमारे शिक्षकगन और शिक्षण व्यवस्था हिंदी या छात्रों के समझ वाली जबान के टेक्स्ट और क्लास प्रस्तुत करेगी यह यक्ष-प्रश्न ही है

दिवाकर मणि ने कहा…

स्मृति की चिन्ता हिंदी पृष्ठभूमि से आए हुए बहुसंख्यक छात्र-छात्राओं की चिन्ता की प्रतिनिधि आवाज है। भारत के शैक्षिक परिदृश्य को स्वरूप प्रदान करने वाले शासन-तंत्र को इस पर अत्यधिक गंभीरता से ध्यान देने की जरुरत है।