मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

रचनाकार का दायित्व...

उदय प्रकाश का ये साक्षात्कार एक मित्र के शोध के सिलसिले में लिया गया था.  कहानी, जीवन, कविता और मोहनदास को लेकर लगभग एक घंटे की बातचीत हुई. ‘मौका है और दस्तुर भी’ के पुराने कहावत को दोहराते हुए ये साक्षात्कार अंश;

मैं बार बार कहता हूं कि भारत में जो जाति व्यवस्था है उसके कन्फ़्लिक्ट कई मायने में नस्लीय कन्फ़्लिक्ट से कम घातक नहीं है आज आदिवासियों के साथ जिस तरह से आप ट्रीट कर रहें हैं इसको आप किस कटेगरी में रखते हैं मुसलमान और हिन्दु में जब कन्फ़्लिक्ट होता है उसको आप कम्युनलिज्म और सेकुलरिज्म के दो पालिटिकल कैटगरी बना लेते हैंआप आज आदिवासियों के साथ जो कर रहें है उसे आप किस कैटेगरी में रखेंगे या दलितों के साथ जो कर रहें हैं, उसे आप किस कैटेगरी में रखेंगे या मेरे जैसे लेखक के साथ जो आप कर रहें हैं उसे आप किस कैटेगरी में रखेंगेये कम्युनल है कि रेसियल है है न.. इसके पीछे जो संदेह और घृणा है वो किस कैटेगरी में जाता है। इस रूप में मोहनदासलिखी ही गयी थी औरि उसमें जो लिखते हुए मुझे ऐसा लगा मैं अपनी ही नहीं सारे  जो वंचित लोग हैं मैं उनकी कहानी कह रहा हूं। और शायद जो डेमोक्रेसी फ़ैल कर गयी है क्योंकि ज्यादा जो इम्फ़ैसिस था इस पर था कि 1989 में समाजवाद फ़ेल कर गया और ये मान लिया गया कि इसका कोई फ़्युचर नहीं हैमेरा कहना ये है कि समाजवाद ही नहीं फ़ेल कर गया है डेमोक्रेसी फ़ेल कर गयी है। लोकतंत्र कहां है ?  आप पढिये फ़ुकुयामा की नयी किताब पोस्ट हुमन फ़्युचर उसमें कहता है कि एंड आफ़ हिस्ट्री हैएंड आफ़ हिस्ट्री उसने इसलिये कहा कि दो ब्लाक्स थे सोशलिस्ट ब्लाक और कैपटलिस्ट ब्लाक  लोकतंत्र और समाजवाददोनों के टकराहट में इतिहास निर्मित हो रहा था और वो जो राजनीति थी ड्राईविंग सीट पर बैठी हुई थी जो आगे ले जा रही थी इतिहास बन रहा था उसने कहा अब ये खतम हो गया युनीपोलर दुनिया हो गयी एकध्रुवीय हो गयी वो कंट्राडिक्शन तो गया, वो द्वंद्व तो गया तो अब इतिहास कैसे बनेगा ?  उसने कहा अब इतिहास का अंत हो गया कोई शीतयुद्ध नहीं है ध्रुवीय व्यवस्थाओं में उस तरह के टकराहट नही है समाज व्यवस्थाओं में उस तरह के रोल माडल नहीं है तो अब इतिहास का अंत हो गया लेकिन अब उसकी जो नयी किताब है उसमें वो चेंज कर रहा है कहता है कि नहीं आप ये सोचिये कि 1789 में जो फ़्रेंच रिवोल्युशन हुआ था उसमें रुसो ने तीन नारे दिये थे स्वतंत्रता, समानता और विश्वबंधुत्व अब ये तीनों कहां है किस देश में है आप अपने सबकान्ट्नेन्ट में देखिये फ़िर तीसरी दुनिया में देखिये... बर्मा में मिलट्री जुंगटा है, श्रीलंका में आपने अभी देखा तीसहजार लोगो का मैसेकर जेनोसाईड आप बांग्लादेश में देखिये, पाकिस्तान में देखिये, हिन्दुस्तानी में देखिये  इतना ज्याद आदमी का, फ़ौज का, पुलिस का इस्तेमाल अपनी जनता के खिलाफ़ हेलिकाप्टर से बम तक गिराने का कोलोकतंत्र क्या कर सकता है ?  अंग्रेजो ने भी नहीं किया ऐसा आप यकीन मानिये जिसको हम कोलोनोइयल पावर कहते है जो बाहर से आये थे उनके अंदर भी थोडी मानवीय चेतना थीतो मुझको कई बार ये संदेह होने लगता है मैं कहता हूं कि ऐसा तो नहीं है कि जोज्योतिबा  फ़ुलेकहते थे वो सही कहते थे कि ये तो अच्छा हुआ कि 1857 की क्रांति सफ़ल नहीं हुई हो जाती तो हम दस हजार साल तक और गुलाम रह जाते। अचानक क्या होता है कि आपको आपके समय को देखने के एक नये दृष्टि मिलती है और आप पाते है कि ये आजादी, ये स्वतंत्रता, ये लोकतंत्र इसकी जो व्याख्या होनी चाहये इसका जो विश्लेषण होना चाहिये यहां कि जो पुरी डेमोग्रफ़ी है जनसांखिय्की है या जो रहने वाले लोग है मनुष्य है उनके संदर्भ में होनी चाहिये ऐसा नहीं है कि आपने एक कांस्ट्रक्ट बाना दिया है कि देखिये हम ये योजना बना रहें हैं, हम इतना इंफ़्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहें है,  इतने कारखाने लगा रहें हैं, पावर प्रोजेक्टस लगा रहें हैं, इतने माईन्स लगा रहें हैं, हम डेवलप कर रहें हैं और हम लोकतंत्र है दुनिया की बिगेस्ट लोकतंत्र हैमैं कह रहा हूं कि आप लोकतंत्र हैं  के नहीं ? बिगेस्ट तो बाद की बात है। पहला प्रश्न तो ये पैदा होता है कि क्या आप लोकतंत्र बने हुए हैं,  अगर हैं तो उसका संविधान तो कुछ कहता होगा, उस संविधान के अनुरुप चल रहें हैं, उसका पहला प्रिएंबल क्या है?  संविधान का पहला प्रीएम्बल क्या है आप उस पर भी स्टिक कर रहें हैं कि नहीं?   मेरा यकीन मानिये कहीं नहींउसको आपने उठा कर के रख दिया है अब लेखक बचता है। लेखक जो है सचमुच इमानदार है तो उसके सामने बडी एकाउंटिबलिटी होती है बडी जिम्मेदारी होती है उत्तरदायित्व होता है क्योंकि वो इतिहास नहीं लिख रहा है। वो जानता है कि मैं इतिहास के बाहर की  एक चीज और लिख रहा हूं, हो सकता है कि वो मेरी निजी डायरी हो या मेरा अपना देखा गया सच हो तो फ़िर वो काम भी करता है रचनाकार करता है लेखक करता है दुनिया भर के लेखक ये करते हैं जो सच्चे हैं।

3 टिप्‍पणियां:

सुशीला पुरी ने कहा…

thanx ...

Harsh ने कहा…

nice blog ...............

Farid Khan ने कहा…

बहुत विचारणीय बातें हैं हमारे समय की।