राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल विदेश के ख्यात नाट्य निर्देशकों के साथ प्रस्तुत करता रहा है। इस कडी में उसने अभी ताज़ा प्रस्तुति की है,‘लिटिल बिग ट्रेज़डिज़’जो रुसी कवि एल्क्ज़ेंडर पुष्किन की कहानियों पर आधारित है। इसका निर्देशन किया है तुर्कमेनिस्तान के ‘ओअव्ल्याकुली खोद्जाकुली’ ने। खोदज़ाकुली तुर्कमेनिस्तान ड्रामा एंड म्युजिकल थियेटर के कला निदेशक रहे और रूस, उज़्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, उक्रेन व तुर्कमेनिस्तान के रंगमंच में सक्रिय रहें हैं। इससे पहले भी वे रा.ना.वि. तृतीय वर्ष के साथ किंग लियर की प्रस्तुति कर चुके हैं 2009 में। खोदजाकुली के कार्य में रंग परिकल्पना मुख्य है, वे अपनी प्रस्तुति को इसी के इर्द गिर्द बुनते हैं। इस प्रस्तुति में भी आकर्षक दृश्यबंध बनाया गया है पर आलेख को समर्थन ना दे पाने की वज़ह से वह निस्तेज़ हो जाता है और उसका महत्त्व बस एक चमत्कार तक सीमित होकर रह जाता है। रंगमंच चमत्कार के भरोसे नहीं किया जा सकता। प्रस्तुति में तीन कहानियां हैं जिनका केन्द्र क्रमशः इर्ष्या, व्यभिचार और अहंकार हैं। ये मनुष्य की सहज प्रवृतियां हैं। पहली कहानी में एन्टोनियो सैलियरी प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा के अन्यायिक वितरण पर असंतोष करता है और अपने दोस्त मोज़ार्ट से इर्ष्या। इसी इर्ष्या के वशिभूत मोज़ार्ट को रोकने के लिये वह उसे ज़हर दे देता है। दूसरी कहानी डान जुआन की है जो एक विधवा से प्रेम करना चाहता है जिसके पति की भी हत्या उसने ही की है, ये अलग बात है कि वह अपनी अनुपस्थिति में अपने प्रेमिका के साथी को मार देता है. अपनी पहचान छुपाकर वह विधवा को प्रेम के लिये राजी कर लेता है पर पहचान अधिक देर तक छुपा नहीं पाता। विधवा डोन्या एना स्तब्ध रह जाती है और मृत्यु की कामना करती है। डान जुआन को विधवा के पति की आत्मा आकर दंडित करती है। तीसरी कहानी में प्लेग से ग्रस्त एक शहर में कुछ लोग कब्रिस्तान में प्लेग के सम्मान में जश्न मना रहें हैं और गीत गा रहें हैं। पादरी कब्रिस्तान में आकर शांति भंग करने के लिये उनको कोसता है। पादरी की बात सुनकर उस समूह का अध्यक्ष सोच में पड जाता है और उसके साथी जश्न मनाते रहते हैं।
तीनों कहानी में अलग अलग पात्र मुख्य भूमिका में हैं बाकी के पात्र कोरस की भुमिका निभाते हैं। पूरी प्रस्तुति के दौरान पात्र मंच पर ही रहते हैं। दृश्य बंध एक कैनोपी का है जिसके उपरी सिरे पर एक मुखाकृति है और वह प्लेटफ़ार्म से रस्सी से जुडा है। समस्त एक्शन इसी प्लेटफ़ार्म पर होता है। इसके पीछे कि हिस्सों को ढक दिया गया जो नेपथ्य का कार्य करता है। प्रकाश और तकनीक के सहारे यह दृश्य बंध नाटक में कुछ जगह पर चौंकाता है पर उसका साम्य आलेख से नहीं बन पाता। किंग लियर की प्रस्तुति के दौराम खोदजाकुली ने तंबु और रस्सी के सहारे कल्प्नाशील दृश्यबंध रचा था जो सादगी के साथ आलेख को आधार देता था और अभिनेताओं की गति इस दृश्यबंध के अनुकुल हो गयी थी। इस प्रस्तुति में अभिनेताओं की देहगति के साथ संवाद की और दृश्यबंध की संगति नहीं बन पाती, जो प्रस्तुति को उबाउ बना देती है। पहली कहानी संक्षिप्त है पर बाकी की दो अनावश्यक रूप से लम्बी हैं। काजल घोष का संगीत प्रस्तुति का उल्लेखनीय पक्ष है जिसे उन्होंने थाल, गिलास, कंचे की धवनियों से तैयार किया है। पुश्किन की एक कविता को भी प्रस्तुति में शामिल किया गया है पर वह भी प्रभावित नहीं करती। संगति के अभाव में कहानियों का मूल कथ्य दबा ही रह गया है और ब्रोश्योर आप ना पढें तो आपको हो सकता है पता भी ना चले।
विदेशी निर्देशकों के आगमन को रंगमंच उत्सुक निगाहों से देखता है। इससे पहले कार्ल वेबर. पीटर ब्रुक और फ़्रित्ज़ बेनेवित्ज़ जैसे निर्देशकों के आगमन ने रंगमंच को एक उर्जा प्रदान की थी। यह प्रस्तुति रंगमंच को कहीं लेकर नहीं जाती बल्कि उसे विभ्रम में छोड जाती है।एक बात तो रेपर्टरी को तय कर लेना चाहिये कि उसे प्रयोगधर्मी प्रस्तुतियां करते वक्त दर्शकों को भी ध्यान में रखना चाहिये। प्रस्तुति के निस्तेज होने का कारण यह भी है कि निर्देशक और अभिनेता के बीच संवाद का माध्यम दुभाषिया है और खबर यह भी है कि रंगमंडल के कुछ अभिनेता इस प्रस्तुति से संतुष्ट नहीं थे। गौरतलब है कि ये प्रस्तुति आगामी राष्ट्रमंडल खेलों के लिये तैयार किये गये हैं जिसमें आगे रंगमंडल की कुछ और प्रस्तुतियां होंगी और पूर्वोत्तर का नाट्य उत्सव इसी सिलसिले में सम्पन्न हुआ है।
बुधवार, 15 सितंबर 2010
सोमवार, 26 जुलाई 2010
सोनवा के पिंजरा
'गंगा मैया तोहे पियरी चढैबो' भोजपुरी की सबसे पहली फिल्म थी. यह सभी मायनों में एक बेहतरीन फिल्म है. भोजपुरी में वैसे बहुत अधिक सिनेमा बनने लगा है पर कोई भी इस स्तर को नहीं छू सका है. गीत और संगीत इस फिल्म की सशक्त पक्ष थे. गीत शैलेन्द्र ने लिखे थे और संगीत चित्रगुप्त का था. इस सिनेमा से यह गीत प्रस्तुत है जो भोजपुरी समाज में लड़की की स्थिति का कारुणिक चित्रण करता है. मोहम्मद रफ़ी के इस गाने को सुनकर अब भी आँखे नाम हो जाती है. यह गीत अर्थ के विविध स्तरों पर खुलता और भीतर तक उतरने को बाध्य करता है.
सोनवा के पिंजरा में बंद भईले हाय राम चिडई के जियवा उदास
टुट गईले डलिया छितर गईले खोतवा छुट गईले नील रे आकाश
सोनवा के पिंजरा में बंद भईले हाय राम चिडई के जियवा उदास
छलछल नैना निहारे चुप चिडई चैन निज देश हार मैया के दुआरवी
आंसुआ के मोतिया निसानी मोर बाबुला धरि गईनी हम तोरे पास
सोनवा के पिंजरा में बंद भईले हाय राम चिडई के जिनगी उदास
बिलखत रहि गईली संग के सहेलिया ले गईल बांध के निठुर रे बहेलिया
मोरे मन मीतवा भुला दे अब हमरा के छोडि के मिलन के तु आस
सोनवा….
http://www.youtube.com/watch?v=LIg5vC3sG-M
सोनवा के पिंजरा में बंद भईले हाय राम चिडई के जियवा उदास
टुट गईले डलिया छितर गईले खोतवा छुट गईले नील रे आकाश
सोनवा के पिंजरा में बंद भईले हाय राम चिडई के जियवा उदास
छलछल नैना निहारे चुप चिडई चैन निज देश हार मैया के दुआरवी
आंसुआ के मोतिया निसानी मोर बाबुला धरि गईनी हम तोरे पास
सोनवा के पिंजरा में बंद भईले हाय राम चिडई के जिनगी उदास
बिलखत रहि गईली संग के सहेलिया ले गईल बांध के निठुर रे बहेलिया
मोरे मन मीतवा भुला दे अब हमरा के छोडि के मिलन के तु आस
सोनवा….
http://www.youtube.com/watch?v=LIg5vC3sG-M
बुधवार, 21 जुलाई 2010
बीच शहर में
रंगमंच पर इन दिनों कुछ नई प्रवृतियां विकसित हो रहीं हैं. एक तो पारस्परिक सहयोग का जिसके तहत अभिनेता, नाट्य संगठन, संसथान और निर्देशक मिल कर प्रस्तुति दे रहें हैं. दूसरी प्रवृति है नाटक को विकसित करने की. इसमें नाटक के लिये कोइ एक थीम चुन कर उसका विकास इम्प्रोवाइजेशन और कार्यशाला के द्वारा किया जा रहा है। इस तरह तैयार नाटक का लिखित आलेख तैयार कर लिया जाता है फ़िर उसकी प्रस्तुति होती है। इस तरह के रंगमंच में अभिनेता केन्द्र में आ गया है और निर्देशक प्रस्तुति का नियंत्रक हो गया है। इसी तरह की एक प्रस्तुति ‘बीच सहर में’ 17 और 18 जुलाई को रा.ना.वि. में हुआ। अलरिप्पु (ALARIPPU) और रा.ना.वि. के साझे से तैयार इस प्रस्तुति का निर्देशन किया त्रिपुरारी शर्मा और अदिति विश्वाश ने.
नई दिल्ली और गुजरात दंगो के परिप्रेक्ष्य में समाज में फ़ैलते जा रहे साम्प्रादायिक असहिष्णुता को नाटक ने अपना विषय बनाया था। इस क्रम में उसने समाज के हिस्सों में बटते जाने को भी चित्रित किया। एक पक्ष जो बिलकुल अंधा होकर हिंसा में अपना योगदान करता है और दूसरा जिसमें यह चेतना अभी बाकी है कि जिन लोगों के साथ वो रह रहें हैं उनको बचाया जाना जरूरी है चाहे वह किसी कौम के हों। इसी विचार के तहत नाटक एक ऐसे साधारण आदमी के असाधारण प्रयास को प्रदर्शित करता है जो अपने परिवार की मदद से गुजरात दंगे में 70 आदमी की जान बचाता है. साथ ही चार महिने तक सरंक्षण और आश्रय प्रदान करता है। जाहिर है दंगाईयों के लिये यह एक अविश्वनीय घटना है।
इस को प्रस्तुत करने के क्रम में नाटक सरंक्षकों और दंगाईयों दोनों के पक्ष को प्रस्तुत करता है. स्मृतियों, बिंबों, नाटक के भीतर नाटक के जरिये प्रस्तुति को तैयार किया गया है. बचाने वाले की खुशी और दंगाईयों की निराशा और हिंसक प्रवृति को नाटक में खास तौर पर उभारने का प्रयास किया गया है. यथार्थ और स्वप्न, जीवित और मृत पात्रों को एक ही स्पेस का हिस्सा बनाने से समाज का अंतर्विरोध उजागर हुआ है. प्रस्तुति के लिये मंच पर प्रापर्टी के रूप में लकडी के बक्सो, फ़्रेम और ट्राली का उपयोग है. मंच के पीछे चित्रित पर्दों को (धुसर रंग के खंडहरों जिन पर खुन के छींटे परे है) लगाया गया है. दृश्यबंध हिंसा के बाद के अवसाद को उभारता है. संगीत ठीक है पर पात्रों का गायन कभी कभी अति नाटकीय हो जाता है.
प्रस्तुति शुरुआत में उबाउ है लेकिन मूल विषय पर आते ही गम्भीर हो गयी है. संभवतः प्रस्तुति अभी विकासशील अवस्था में है और इस पक्ष पर काम किये जाने की जरूरत है. नाटक का कथ्य अत्यंत संवेदनशील है जो असहिष्णु होते जा रहे समाज में एक ‘आदमी’ के बचे रहने को दिखाता है. अतः प्रस्तुति में आगे काफ़ी सम्भावनायें हैं. कुछ अभिनेताओं ने उम्दा अभिनय किया है पर कुछ काफ़ी कमजोर हो गये जिससे प्रस्तुति में संतुलन नहीं आता.
नई दिल्ली और गुजरात दंगो के परिप्रेक्ष्य में समाज में फ़ैलते जा रहे साम्प्रादायिक असहिष्णुता को नाटक ने अपना विषय बनाया था। इस क्रम में उसने समाज के हिस्सों में बटते जाने को भी चित्रित किया। एक पक्ष जो बिलकुल अंधा होकर हिंसा में अपना योगदान करता है और दूसरा जिसमें यह चेतना अभी बाकी है कि जिन लोगों के साथ वो रह रहें हैं उनको बचाया जाना जरूरी है चाहे वह किसी कौम के हों। इसी विचार के तहत नाटक एक ऐसे साधारण आदमी के असाधारण प्रयास को प्रदर्शित करता है जो अपने परिवार की मदद से गुजरात दंगे में 70 आदमी की जान बचाता है. साथ ही चार महिने तक सरंक्षण और आश्रय प्रदान करता है। जाहिर है दंगाईयों के लिये यह एक अविश्वनीय घटना है।
इस को प्रस्तुत करने के क्रम में नाटक सरंक्षकों और दंगाईयों दोनों के पक्ष को प्रस्तुत करता है. स्मृतियों, बिंबों, नाटक के भीतर नाटक के जरिये प्रस्तुति को तैयार किया गया है. बचाने वाले की खुशी और दंगाईयों की निराशा और हिंसक प्रवृति को नाटक में खास तौर पर उभारने का प्रयास किया गया है. यथार्थ और स्वप्न, जीवित और मृत पात्रों को एक ही स्पेस का हिस्सा बनाने से समाज का अंतर्विरोध उजागर हुआ है. प्रस्तुति के लिये मंच पर प्रापर्टी के रूप में लकडी के बक्सो, फ़्रेम और ट्राली का उपयोग है. मंच के पीछे चित्रित पर्दों को (धुसर रंग के खंडहरों जिन पर खुन के छींटे परे है) लगाया गया है. दृश्यबंध हिंसा के बाद के अवसाद को उभारता है. संगीत ठीक है पर पात्रों का गायन कभी कभी अति नाटकीय हो जाता है.
प्रस्तुति शुरुआत में उबाउ है लेकिन मूल विषय पर आते ही गम्भीर हो गयी है. संभवतः प्रस्तुति अभी विकासशील अवस्था में है और इस पक्ष पर काम किये जाने की जरूरत है. नाटक का कथ्य अत्यंत संवेदनशील है जो असहिष्णु होते जा रहे समाज में एक ‘आदमी’ के बचे रहने को दिखाता है. अतः प्रस्तुति में आगे काफ़ी सम्भावनायें हैं. कुछ अभिनेताओं ने उम्दा अभिनय किया है पर कुछ काफ़ी कमजोर हो गये जिससे प्रस्तुति में संतुलन नहीं आता.
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