गुरुवार, 27 जनवरी 2011

गुलज़ार :गीत यात्रा के पांच दशक(भाग-एक)


गंगा आये कहां से’ ‘काबुलीवालाके इस गीत के साथ गुलजार का पदार्पण फ़िल्मी गीतों के क्षेत्र में हुआ था। बंदिनीके गीत ‘मोरा गोरा अंग लईले’ से गुलज़ार फ़िल्म जगत में प्रसिद्धी पा गये। लगभग पांच दशकों से वे लगातार दर्शकों को अपनी लेखनी से मंत्रमुग्ध किये हुए हैं। इस सफ़लता और लोकप्रियता को पांच दशकों तक कायम रखना निश्चय ही उनकी असाधारण प्रतिभा का परिचय़ देता है। इस बीच में उनकी प्रतिस्पर्धा भी कमजोर लोगो से नहीं रही। जनता और प्रबुद्ध दोनों वर्गों मे उनके गीत लोकप्रिय हुए। उनका गीत देश की सीमाओं को लांघ कर विदेश पहुंचा और उसने आस्कर पुरस्कार को भी  मोहित  कर लिया और ग्रैमी को भी |
  गुलज़ार बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। फ़िल्मों मे निर्देशन, संवाद और गीत  लेखन के साथ अदबी जगत में भी सक्रिय हैं। गुलज़ार का फ़िल्मकार रूप मुझे हमेशा आकर्षित करता रहा है। लोकप्रिय सिनेमा की सरंचना में रहते हुए उन्होंने सार्थक फ़िल्में बनाई हैं। उनके द्वारा निर्देशित फ़िल्मों की सिनेमा के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण जगह है। मेरे अपने, कोशिश, मौसम, आंधी, खुशबु, परिचय, इजाजत, माचिस इत्यादि  उनके द्वारा निर्देशित फ़िल्में एक व्यवस्थित और विस्तृत अध्ययन की मांग करती हैं। मेरा ध्यान इस वक्त सिर्फ़ उनके गीतों और वो भी फ़िल्मों में लिखे गीतों पर केंद्रित है।
    गुलज़ार के गीतों की तह में जाने से पहले कुछ सूचनात्मक जानकारियां बांट ली जाये। गुलज़ार ने अब तक लगभग सौ फ़िल्मों के लिये गीत लिखें हैं और बाइस फ़िल्में निर्देशित की हैं। कुछ फ़िल्मों के लिये संवाद भी लिखे हैं जिसमें आनंद, नमकहराम, माचिस ,साथियां इत्यादि हैं।
  गुलज़ार अब तक सात राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। सर्वश्रेष्ठ निर्देशन - मौसम, सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म - माचिस, सर्वश्रेष्ठ गीत - मेरा कुछ सामान (इजाजत), यारा सीली सीली (लेकिन), सर्वश्रेष्ठ पटकथा - कोशिश, सर्वश्रेष्ठ वृतचित्र - पं भीमसेन जोशी और उस्ताद अमजद अली खान। गीतों के लिये गुलज़ार को नौ फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला। निर्देशन के लिए एक (मौसम), कहानी के लिये एक (माचिस), फ़िल्म के लिये एक (आंधी ,समीक्षक) और संवाद के लिये चार (आनंद, नमकहराम, मचिस और साथिया।) फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला है।
उनके कहानी संग्रह धुआं के लिये 2003 में उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड मिला और 2004 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भुषण से समानित किया।
गुलज़ार के गीतों में प्रवेश के लिये किस रास्ते का प्रयोग किया जाये इस पर विचार के बाद सबसे आसान लगा कि उनके गीत यात्रा का दशक के अनुसार अध्ययन कर लिया जाये इससे बहुत सारे तथ्य एक साथ उजागर हो जायेंगे।
गुलज़ार ने फ़िल्मों में गीत लेखन की शुरुआत 1961 मे फ़िल्म ‘काबुलीवाला’ से की,  गीत था ‘गंगा आये कहां से’। इस दशक यानि 60-70 में गुलज़ार ने बंदिनी(63), पुर्णिमा(65), दो दुनी चार(68), और खामोशी(69) में गीत लिखा। मोरा गोरा अंग लई ले (बंदिनी), तुम्हें जिंदगी के उजाले मुबारक (पुर्णिमा), वो शाम कुछ अजीब थी और हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबु (खामोशी) इत्यादि गीत बेहद लोकप्रिय हुए। इन गानों से ही गुलज़ार के रेंज़ का पता चलता है। ‘पी’ के रंग में रंग जाने की इच्छा से लेकर रिश्तों की खुबसुरती का बेनामीपन और जिंदगी के उजालों को प्रिय के लिये छोड कर स्वयं को अंधेरें का अभ्यस्त बताने की उदासी गीतों की इस विविधता ने निश्चय ही सिनेमा जगत को एक समर्थ गीतकार के उदय की सूचना दे दी होगी। 
70-80 के दशक में गुलज़ार ने सीमा, गुड्डी, मेरे अपने (71), परिचय (72), मौसम, खुशबु, आंधी (75), घर, खट्टा-मीठा, किनारा, घरौंदा, किताब (77), गोलमाल (79),इत्यादि फ़िल्मों के लिये गीत लिखा। इस दशक में फ़िल्मों की संख्या अधिक हैं और गीतों की भी। गौरतलब है कि यहीं वो दशक है जिसमें गुलज़ार ने निर्देशन की कमान संभाली और मेरे अपने, परिचय, मौसम, खुशबु, आंधी व किताब का निर्देशन किया। फ़िल्मों की सरंचना में गीतों को घुला देने और उनके खुबसुरत फ़िल्मांकन के उदाहरण के तौर पर इन फ़िल्मों को देखा जा सकता है। हालचाल ठीक ठाक है (मेरे अपने), तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा (आंधी), दिल ढूंढता है फ़िर वहीं (मौसम) गीतों को हटाकर इन फ़िल्मों को देखा जा सकता है क्या? आखिरकार गुलज़ार विमल राय और हृषिकेश मुखर्जी के सहायक रह चुके थे। इस दशक में गुलज़ार को मौसम के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। दो दीवाने शहर में (घरौंदा 77), और आनेवाल पल जाने वाला है( गोलमाल 79) को सर्वश्रेष्ठ गीत का फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला।
अपने कैरीयर के तीसरे दशक (80-90) में खुबसुरत, थोडी सी बेवफ़ाई (80), बसेरा (81), मासुम, सदमा (83), इजाजत, लिबास(88) इत्यादि फ़िल्मों में गुलज़ार ने गीत लिखे। पिया बावरी ( खूबसूरत), आंखों में हमने आपके सपने सजाये हैं (थोडी सी बेवफ़ाई),  जिंदगी गले लगा ले (सदमा), रोज रोज आंखो तले (जीवा), खाली हाथ शाम, मेरा कुछ सामान (इजाजत) सीली हवा छु गयी (लिबास) इत्यादि इस दशक के बेहद लोकप्रिय गाने थे। हजार राहें, (थोडी सी बेवफ़ाई), तुझसे  नाराज नहीं (मासुम) और  मेरा कुछ सामान को फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला था। उल्लेखनीय है कि इस दशक को हिन्दी सिनेमा के पतन का दौर माना जाता है। अभी तक हिन्दी सिनेमा इतने खराब दौर से नहीं गुजरा था। व्यावसायिकता और स्तरीयता दोनों मोर्चों पर यह विफ़ल हो रहा था। हिन्दी सिनेमा गीत संगीत का सुनहला दौर देख चुका था और इस दशक में सबसे  बुरी हालत गीत संगीत की ही थी। लेकिन इस खराब दौर में भी गुलज़ार ने अंगुर, इजाजत, और लिबास जैसी फ़िल्म बनायी। उनके गीत इस दौर के संगीत पक्ष के गिरावट से अछूते रहे। तुझसे नाराज नहीं जिंदगी और मेरा कुछ सामान जैसे गीतों से नयी उंचाइयों को छुआ।
1990-2000 के बीच में गुलज़ार की लेकिन (91), माया मेमसाहब, रुदाली(93), माचिस(96), आस्था(97), दिल से, सत्या(98), जहां तुम ले चलो, हु तु तु(99), इत्यादि फ़िल्में आई।  बीसवीं सदी का यह अन्तिम दशक हिन्दी सिनेमा के लिये वैसा दशक है जब हिन्दी सिनेमा में बहुत कुछ परिवर्तित हो रहा था। मार धाड और बुरे संगीत से दर्शक लगभग उब गये थे और फ़्रेश की तलाश में थे। फ़िल्मों का फ़्लाप होना जारी  था लेकिन वो फ़िल्मे हिट हो रहीं थीं जिनमें कुछ नयापन था। मैनें प्यार किया, हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुलहनिया ले जायेंगे, सत्या, कुछ कुछ होता है, इत्यादि जैसी अत्यधिक सफ़ल फ़िल्में इस दौर में बनी। खास बात कि इन फ़िल्मों की सफ़लता में गीत संगीत का बहुत योगदान था। अभिनेता, निर्माता, निर्देशक, संगीतकार, गीतकार की एक पूरी नयी जमात सामने आ गयी थी और गुलज़ार की जगह बकायदे बुजुर्ग की हो गयी थी। मजबुत पेड़ अपनी जगह हमेशा बरकरार रहते हैं और हमेशा नये पत्ते, फ़ुल औए फ़ल देते रहतें हैं। गुलज़ार ने अपने को नये जमाने के हिसाब में ढाला, बिना स्तर गिराये हुए, बिना समझौता किये। हां उन्होंने फ़िल्मों की संख्या जरुर कम कर दी। इस दशक में उन्होंने एक ओर ‘यारा सीली सीली’ (लेकिन 91) लिखा दुसरी ओर ‘गोली मार भेजे में’ मनोविज्ञान और  दर्शन को यह गीत  बखूबी व्यक्त करता है। ‘छोड आये हम वो गलियां’ (माचिस 96) से उनका दार्शनिक अंदाज बरकरार रहा तो ‘चुपड़ी चुपड़ी चाची’ (चाची 420) से बाल सुलभ  अंदाज भी। रुदाली, और दिल से का  सभी गीत लोकप्रिय हु। यारा सीली सीली (लेकिन, 91) और चल छैयां छैयां (दिल से, 98) को फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड मिला। 
वर्तमान दशक (2000-10) में  भी गुलज़ार की आंच कम नहीं हुई है और उसी लौ में जल रहे है जो 61 में जली थी। फ़िजां, अक्स (2000), फ़िलहाल, अशोका (02), साथिया, चुपके से (03) पिंजर, मकबुल (04) रु-ब-रु, बंटी और बबली (05), झुम बराबर झुम, नो स्मोकिंग, दस कहानियां (07), युवराज(08), बिल्लु, स्लमडाग मिलेनर, कमीने(09) की लंबी लिस्ट ये बता रही है कि इस दशक में वो अधिक सक्रिय हो गये हैं। इस दौर में उनकी चमक फ़िल्मफ़ेअर (साथिया और बंटी और बबली) से आगे जाकर स्कर (जय हो,स्लम्डाग मिलेनर,09) तक पहुंच गयी है। आ धू मलूँ (फ़िजा), बंदा ये बिंदास है (अक्स), साथियां (साथियां), मार उडारी (पिंजर), रु-ब-रु (मकबुल), फ़ूंक दे (नो स्मोकिंग), बोल ना हल्के हल्के (झुम बराबर झुम), बीड़ी जलाईले (ओमकारा), तु ही तो मेरी दोस्त है (युवराज), धन ते नान (कमिने) इत्यादि गीत चार्ट बस्टर मे लगातार उपर की पायदानों मे बजे हैं। कजरारे कजरारेने लोकप्रियता के सारे  मानदंड तोड़ दियें है। वैसे इसी दशक में गुलज़ार ने किस आफ़ लव, टिकट टू हालीवुड (झुम बराबर झुम), मरजानी मरजानी (बिल्लु) जैसे गीत भी लिखें है जो उनकी सूची से मेल नहीं खाते। यह शायद प्रयोग की उत्सुकता या फ़िल्म की मांग है परंतु ऐसे गीतों से वे बच सकते हैं। जारी...
यह आलेख वाक के आठवें अंक में प्रकाशित हो चुका है.

रविवार, 23 जनवरी 2011

विवाह गीत


१.
काहे को ब्याहे बिदेस अरे सुन बाबुल मोरे
मैं बाबुल तोरे आंगन की पंक्षी
फ़ुदक फ़ुदक उड़ि जाउं रे
सुन बाबुल मोरे

मैं बाबुल तोरे आंगन की गंइया
जहां बांधो, बंध जाऊं रे
सुन बाबुल मोरे

चार बरस पहले गुड़िआ छोड़ा
छुटा बाबुल तोरा देस रे
सुन बाबुल मोरे

जाई डोली पहूंचि अवधपुर
छूटा जनक तोरा देस रे
सुन बाबुल मोरे

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सेनुरा बरन हम सुन्दर हो बाबा, इंगुरा बरन चटकार हो
मोतिया बरन बर खोजिहा हो बाबा, तब होइ हमरा बियाह हो
ताल सुखीय गईले पोखरा सुखीय गईले, इनरा परे हाहाकार हो
बेटी के बाबुजी के दलकी समा गईले कईसे में होईहे बियाह हो
जाई ना बाबा अवधपुर नगरिया राजा दशरथ के दुआर हो
राजा दशरथ के चार बेटवा, चारु सं बाड़े कुंवार हो
चार भईया में सुन्दर बर सांवर उनके के तिलक चढ़ाव हो
ताल भरीय गईले पोखरा भरीये गईले इनरा पर परे झझकार हो
बेटी के बाबुजी के खुसिया समा गईल, अब होईहे धर्म बियाह हो.

हमारे समाज में हर रश्म के लिये गीत हैं और ये गीत ऐसे ही नहीं हैं. ये अपने समाज और अपनी परंपरा से जुड़े हुएं हैं. इनका स्रोत पौराणिक संदर्भ और प्राण लोक जीवन है. ये गीत भी मेरी माता जी की डायरी के सौजन्य से.
संकलन- रीता मिश्र


शनिवार, 8 जनवरी 2011

भाषा, ज्ञान और वर्चस्व

स्मृति का यह अनुभव यथार्थ है जो हमारे देश के उच्च शिक्षा के परिसरों में फ़ैला है. यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें न जाने कितने वर्षों से उच्च शिक्षा के आकांक्षी विद्यार्थियों के स्वप्न टूट रहे हैं. इसके विरोध में उठी कोई भी आवाज़ नक्कारखाने की तुती है. ये आवाज़ भी सही...

भाषा  अभिव्यक्ति और ज्ञान  की अभिव्यक्ति का एक मूलभूत माध्यम है यह एक मान्य अवधारणा है. या युं कहें कि एक स्वीकृत सत्य है. परन्तु चार्ल्स टेलर के शब्दों मे इससे भी बड़ा सत्य है कि भाषा ज्ञान का निर्माण भी करती है. भाषा सत्य की सरंचना में भी अहम भूमिका निभाती है. ज्ञान और सत्य का रिश्ता जगजाहिर है.
खैर, मेरा उद्देश्य भाषा से जुड़े इन प्रश्नों पर आपका ध्यान दिलाने का नहीं है. मेरी रुचि केवल यह बताने में है कि भाषा  ज्ञान  के निर्माण से जुड़ी है. फ़ुको के शब्दों में ज्ञान  शक्ति के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है. अतः भाषा और शक्ति का भी सीधा संबंध है.
यहां मैं भाषा और शक्ति के संबंध को इस बड़े विवादित प्रश्न से नहीं वरन अपने शैक्षणिक अनुभवों से जोड़ने का प्रयास कर रही हूं. बिहार से इंटरमिडियेट की शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्याल में राजनीति विज्ञान  विषय में दाखिला लिया. विषय को ठीक से समझने और उसे व्यक्त करने के कारण और अंग्रेजी में हाथ तंग होने के कारण मैंने हिन्दी को माध्यम के रूप में चुना, तब तक मैं इस बात से अनजान थी कि भाषा की भूमिका अभिव्यक्त की सुविधा ही सिर्फ़ नहीं है.
प्रथम वर्ष में हिन्दी की पुस्तकों पर आश्रित रहने के बाद दूसरे वर्ष में मैंने अंग्रेजी की भी पुस्तकों का उपयोग किया. तीसरे वर्ष में मैंने सिर्फ़ अंग्रेजी की पुस्तकों का सहारा लिया लेकिन परीक्षा में रीमिक्स यानी हिंग्लिश का प्रयोग किया. मेरा नतिज़ा पिछले दो वर्षों से बेहतर था. यह किस्सा इसलिये नहीं बताया कि अंग्रेजी के प्रयोग ने मेरे अंक को बढ़ा दिया. बल्कि इसलिये कि मेरी समझ में धीरे धीरे आना शुरु हो गया था कि हिन्दी को माध्यम के रूप में उपयोग करने वाले के लिये राजनीति विज्ञान  उतना स्पेस नहीं दे सकता. स्नातकोत्तर का प्रथम वर्ष मेरे तीन सालों से भी अधिक संघर्षपूर्ण रहा. विषय की सभी शाखाओं के रीडिंग पैकेज अंग्रेजी में थे और मेरे जैसे बहुत से छात्रों को यह मान कर चलना था कि हमें इसी माध्यम में चीजों को पढना होगा बेहतर अंक और समझ के लिये. यहां से नयी जद्दोजहद शुरु हुई. पहले रीडींग को पढना, पहले पाठ में केवल अंग्रेजी के जटील शब्दों के अर्थ को जानना, दुसरे में अर्थ को संदर्भ में समझने की कोशिश करना, तीसरे में यह समझना की रीडींग किन पहलुओं को उजागर कर रहा है और चौथे में निहितार्थ समझना. अब सोचिये कि जिस पाठ को अंग्रेजी माध्यम के छात्र एक बार में समझ सकते थे उसे हमें चार बार में समझना पड़ता था. और यह समझ भी संतोषजनक नहीं थी क्योंकि अपरिचित भाषा से प्राप्त  ज्ञान  कितना सुदृढ़ होगा ?
प्रथम सेमेस्टर में हिन्दी माध्यम के अधिकांश छात्र फ़ेल हुए, विवशता में अंग्रेजी को अपना माध्यम बनाये छात्रों में से एक मेरी भी स्थिति अच्छी नहीं थी. दूसरे से चौथे सेमेस्टर तक हिन्दी माध्यम के अधिकांश विद्यार्थी या तो इस विषय को छोड़ चुके थे या किसी तरह संघर्षरत थे, पचपन प्रतिशत बनाने के लिये क्योंकि एम.फ़िल. प्रवेश की यह न्युनतम अहर्ता होती है. अब उनका संघर्ष विषय को समझने का नहीं बल्कि अध्ययन को जारी रखने का था.
 यह पूरा दोष भाषा का नहीं है. परंतु यह प्रश्न तो है कि क्या अधिकांश हिन्दी माध्यम के छात्र कमजोर थे. वे प्रतिभाशाली नही थे या उनकी असफ़लता का कारण भाषा भी थी. भाषा का यह भेद भाव नया नहीं है. मेरा क्षोभ इस बात का है कि दिल्ली विश्वविद्यालय या कुछ बड़े केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान का अध्ययन केन्द्र हर प्रकार के भेद भाव का अध्ययन करती है चाहे वह जाति का हो लिंग का हो धर्म का हो या समुदाय का हो मगर भाषा के क्षेत्र में जो यहां होता है या पुरे एकेडेमिक क्षेत्र में होता है, उनकी बात क्यों नहीं करते? शायद यह उपेक्षा इसलिये भी है क्योंकि भाषा की तानाशाही कायम रखी जा सके ताकि एक विशेष प्रकार के ग्यान का उत्पादन हो सके जो इनके वर्चस्व को कायम रखने में मदद करे.
मेरा वास्ता उन छात्रों के दर्द से है जिसमें भारत के सुदुर हिस्से से आनेवाले छात्र उच्च शिक्षा हासिल का सपना लिये हजारों मिल दूर आते हैं. परन्तु उनका स्वप्न भाषा की तानाशाही तले कुचल जाता है, इन सपनों के टूटने की जिम्मेवारी कौन लेगा. क्या वे एक अजनबी भाषा के अनुकूल अपने को बनाये या उससे पराजित होकर शस्त्र रख दे. दुनिया की ज्ञान परम्परा गवाह है कि एक अज़नबी भाषा में मौलिक ज्ञान का निर्माण नहीं सो सकता. उसमें तो नकल ही हो सकती है जिसमें हम माहिर हैं. लेकिन एक प्रश्न अंग्रेजी भाषा के साम्राज्यवादियों सी भी है कि क्या वे इन अध्ययन केन्द्रों को समावेशी बनायेंगे ताकि ज्ञान का निर्बाध प्रवाह नीचे तक हो