बुधवार, 11 जुलाई 2012

समय की, समय से आगे की खांटी बिहारी अभिव्यक्ति- भिखारी ठाकुर


  भिखारी ठाकुर ने एक परंपरागत नाट्य रूप का परिष्कार उसे अपनी शैली में ढाला और नाट्य रचनायें की। इनके रंगमंच पर लीला नाट्य, लौंडा नाच, यात्रा, नाचा, नौटंकी का प्रभाव पड़ा जिससे आवश्यकतानुसार सामग्री लेकर इन्होंने अपनी शैली बनाई। जो उनके एक नाटक के आधार पर ‘बिदेसिया’ के नाम से ख्यात हुई। भिखारी ठाकुर उस अवधारणा के प्रतिवादी उदाहरण हैं जो यह मान कर चलता है कि आधुनिक हिंदी रंगमंच जिस समय बन रहा था उस समय पारंपरिक रंगमंच जड़ था और कवायद भर था। नौटंकी के उदाहरण से हम देख सकते हैं कि किस तरह नौटंकी ने समय के प्रवाह में अपने को बदला और समकालीनता से जोड़ा। साथ ही इसने उन प्रश्नों को भी समेटा जो अत्यंत जरूरी थे तथा जिन्हें राष्ट्रीयता, आजादी, एकता इत्यादि प्रश्नों   के समांतर  छोटा मान लिया गया था। तिलक महोदय ने  १८९५ में कांग्रेस के सम्मेलन में किये जाने वाले नेशनल सोशल कांफ़्रेंस पर रोक लगा दी थी।  बाबा साहब भीमराव अंबेडकर उसी समय अपने प्रश्नों से समाज की परिक्षा ले रहे थे और जाति प्रथा के दंश को उजागर कर रहे थे। भिखारी ठाकुर ने नाई जाति जैसे एक पिछड़े और सेवक जाति में जन्म लेकर अपने को चेतन किया और अपने नाटकों से समाज को आभिजात्य को चौंकाया और झकझोरा  साथ ही उनसे सवाल भी किया जो मुख्यधारा की रंगमंच नहीं कर पाई थी। भिखारी ठाकुर ने दस के करीब नाटक लिखे थे और उनका मंचन घूम घूम के किया था। इनके नाटकों में तत्कालीन समाज का यथार्थ चित्र मिलता है। प्रवासी मजदूरों का रोजगार की तलाश में पलायन और उनके वियोग में पत्नियों का विलाप और उस पर समाज की कुत्सित नजर को दर्शाते हुए उन्होंने ‘बहारा बहार अर्थात बिदेसिया’ नाटक लिखा। पलायन की समस्या आज भी भोजपुरी समाज का यथार्थ है और भिखारी के समय से कई गुना बढ़ गई है। ‘भाई विरोध’ में संयुक्त परिवार के बिखराव की कहानी थी। और ध्यान देने की बात यह है कि इसमें इन्होंने पात्रों के नाम मनोवृतियों  के नाम पर रखे हैं। भारतेंदु ने भी अपने नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में जयशंकर प्रसाद ने ‘कामना’ में और ‘प्रबोध चंद्रोदय’ में यह परंपरा मिलती है।  ‘बेटी वियोग’ में पैसा लेकर बेटी का बेमेल विवाह करने की समस्या को दिखाया गया है जो उस समय के निर्धन निम्न जातीय समाज में प्रचलित था। ‘कलयुग प्रेम’ में नशाखोरी और वेश्यागमन का, ‘गंगा असनान’ में घर के बुजुर्ग के प्रति निरादर का, ‘विधवा विलाप’ में विधवा की समस्या को उठाया गया। तात्पर्य यह कि उनके सभी नाटक किसी ना किसी समस्या से आधारित है। आश्चर्य जनक रूप से इनके नाटक ‘गबर घिचोर’ की साम्यता बर्तोल्त ब्रेख्त के नाटक ‘काकेशियन चाक सर्किल’ से मिलती है। साथ ही अपनी ही कोख पर अधिकार ना रखने वाली स्त्री के कोख पर उसके अधिकार को स्थापित करती है। गीत और नृत्य से युक्त शैली में इन नाटको का मंचन होता था। भिखारी अपने दल के निर्देशक भी थे और अभिनेता भी थे। इस मानी में वे एक विरल प्रतिभा थे। समाज से जुड़ी समस्याओं की केन्द्रियता का एक कारण यह भी था कि भिखारी रोजगार के लिये बंगाल में रहे थे बंगाल उन्हीं दिनों सामाजिक उथल पुथल और जागरूकता का केंद्र था। भिखारी इससे कैसे अछूते रह सकते थे।  जावेद अख्तर खां भिखारी ठाकुर के बारे में  कहते हैं  “दरअसल वे नवजागरणकालीन चेतना की खांटी बिहारी अभिव्यक्ति हैं”  “वे अपने ग्रामीण परिवेश से बाहर दुनिया देखने निकले और नये विचारों के साथ शहर (कलकत्ता) से लौटे थे, लेकिन इन विचारों को उन्होंने अपने क्षेत्र की जनता के हिसाब से अनुकूलित किया।(चंद्रशेखर 2011: 29) वैचारिक अंतर्वस्तु का एक स्रोत स्थानीय अनुभव था अर्थात कृषक समाज के भौतिक जीवन के ठोस अनुभव से और दूसरा बंगाल के समाज सुधार अंदोलनों से प्रभावित मध्यवर्ती, सुधार चाहने वाले मध्यवर्ग की आकांक्षाओं से लिया गया था।(चंद्रशेखर11: 41)चुंकि समाज सुधार आंदोलनों का भी केंद्र नारी समस्या ही थी इसलिये भिखारी के नाटकों की केन्द्र में भी नारी है। एक सामंती समाज में हाशिये की जाति होकर नारी की समस्या को उठाना समय से आगे की क्रांतिकारीता थी इसीलिये वे उस समाज की आंखो में खटके भी। उन पर हमले हुए, उन्हें नीचा दिखाया गया। लेकिन भिखारी इन सबके बीच अपनी कला को जन जन तक पहूंचाते रहे। चुंकि साहित्यिक आभिजात्य रंगमंच पारंपरिक रंगमंच से दूरी बनाकर चल रहा था तो भिखारी को भी मुख्यधारा के रंगमंच से बाहर समझा गया। वैसे भी भिखारी ठाकुर एक जनभाषा में नाटक कर रहे थे, भोजपुरी जैसी बोली में, जिन्हे हिंदी के सामने आत्मसमर्पण कर देना पड़ा था।  राहुल सांकृत्यायन ने ठीक ही भिखारी को अनगढ़ हीरा  कहा था क्योंकि वे ‘आधुनिक शिक्षित’ नहीं थे जो अपनी कला को आधुनिक मूल्य पर परिष्कृत कर पाते । बड़ी नाक वाले दोष सुंघते रहे भिखारी अपना नाटक करते रहे।

7 टिप्‍पणियां:

Punj Prakash ने कहा…

सुन्दर आलेख | रंगमंच की मुख्यधारा पारंपरिक रंगमंच को मानना चाहिए |

PARVEZ AKHTAR ने कहा…

अच्छा लेख है | बधाई !
यह वर्ष भिखारी ठाकुर का 125वाँ जयंती-वर्ष है |
उनको लेकर, साल भर कार्यक्रम की योजना बनाई जानी चाहिए !
कला-संस्कृति विभाग, बिहार सरकार को मैं एक प्रस्ताव आज ही देने की सोच रहा हूँ |

amitesh ने कहा…

शुक्रिया. वर्ष भर कार्यक्रम होना ही चाहिये और आपके इस पहल में किसी प्रकार के सहयोग के लिये तत्पर.

Unknown ने कहा…

बधाई ! अमितेस भईया पढ़ कर काफी अच्छा लगा...

PARVEZ AKHTAR ने कहा…

मित्रो, कल इस सन्दर्भ में मैंने पहल कर दी है, विभागीय मंत्री से भी प्रारंभिक बात की है और उन्होंने नीतिगत सहमति भी दी है | 'महत्त्व भिखारी ठाकुर' या 'भिखारी ठाकुर समारोह' के आयोजन की रूप-रेखा तैयार कर रहा हूँ | आप सब कार्यक्रम के स्वरुप और अपने स्तर पर क्या 'कंट्रीब्यूट' कर सकते हैं - इस सम्बन्ध में बताएँ |

amitesh ने कहा…

मेरा सुझाव यह है कि भिखारी ठाकुर पर केन्द्रित एक सिम्पोजियम रखा जाये जिसमें भिखारी के संपूर्ण साहित्यकर्म/रंगकर्म का विश्लेषण हो. दूसरा यह किया जा सकता है कि नाटक मंडलियों को भिखारी ठाकुर की रचनाओं की नवीन संदर्भों में प्रस्तुति के लिये प्रेरित कर उनका एक समारोह कराया जाय. नाटककार के अलावा भी भिकारी ठाकुर का योगदान बहुत है उसको भी ध्यान में रखा जाय. सिम्पोजियम वाले क्षेत्र में मैं सहयोग कर सकता हूं...

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