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सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

रंग समीक्षा

मैकबेथ मैकबेथ 


अब जब आधुनिकता की परियोजना पर सवाल उठाये जाने लगे हैं, ज्ञानोदय और पुनर्जागरण के महा वृतांतो का स्थापत्य चरमराने लगा है, क्या रंगमंच इन बहसों को सशक्त तरीके से उठा सकता है ? आप इसका जवाब सोचते रहें, मैं कहूँगा हां. रंगमंच ने यह काम शुरू कर दिया है. इसका ताजातरीन उदाहरण संसप्तक द्वारा की गयी प्रस्तुति ‘मैकबेथ मैकबेथ’ है. यह मूल बंगाली नाटक का हिन्दी संस्करण है. आलेख और निर्देशन तोरित मित्रा का है. नाटक महान शेक्सपियर की ख्यात कृति ‘मैकबेथ’ से आधार ग्रहण करती है. ‘मैकबेथ’ को केन्द्र में रखते हुए औद्योगिक क्रान्ति और  पुनर्जागरण  (प्रस्तुति जिसे व्यापार प्रतियोगिता और  नवजागरण कहती है) के पीछे की मंशा को उजागर करती है. प्रस्तुति में डंकन की मौत पूंजीवाद का रास्ता साफ़ करती है और इसके कारक बनते है मैकबेथ और लेडी मैकबेथ. यद्यपि इसके पीछे उनके निजी कारण भी हैं पर वे महान कारण का हवाला देकर छुपाये जा रहें हैं. नाटक ‘मैकबेथ’ को एक बहस में तब्दील कर देती है. मैकबेथ जो बुढा होकर वर्तमान का अभियोगी है  यह स्वीकार करता है कि उससे भूल हुई थी और वह पूंजीवाद के हाथों का खिलौना बन गया था. प्रस्तुति वर्तमान और अतीत के सहारे पूंजीवाद से लेकर वैश्वीकरण के पीछे की राजनीति को स्पष्ट करता है. चुटीलेपन के लिए कुछ वास्तविक नाम का सहारा भी लेता है. प्रस्तुति में यह बहस घुला मिला हुआ है. नाटक इस तथ्य को रेखांकित करती है की किसी भी प्रक्रिया को लाने के लिए कितने दबाव कार्य करते हैं जिन्हें अपरिहार्यता के आड़ तले छुपाया जाता है. नाटक यह दिखाता है की पश्चिम बाज़ार के विस्तार के लिए कैसे पूर्व से मिलने को आतुर था.  
नाटक में शेक्सपियर को भी आलोचना के घेरे में लाया जाता है और उसके आलोचकों का हवाला दिया जाता है. लेकिन अंततः उसकी महानता को रेखांकित करता है जिसने बड़े ही सशक्त ढंग से अपने समय के विरोधों को अपने नाटकों में चित्रित किया है. विखंडन की तकनीक का सहारा लेकर   नाटक को पुराने अर्थ से मुक्त कर प्रस्तुति उसे विमर्श का माध्यम बना देती है. बच्चो के गीत ‘बाबा ब्लैकाशीप’ नाटक में कई बार प्रयुक्त हुआ है जो नव सामंती अर्थ तंत्र को चित्रित करती है. प्रस्तुति की खूबी यह है कि इतने गंभीर विमर्श को समेटने के साथ उसको संभालती भी है बिना हल्का हुआ लेकिन रंगमंचीय स्तर पर कई खामियां भी हैं.
प्रस्तुति में कुछ पात्रों का अभिनय लाउड हो गया है जिसकी आवश्यकता नहीं थी. नाटक में हिन्दी की व्याकरणिक भूले हैं और अनुवाद में तरलता नहीं है जो कई दर्शको नहीं पचता. एक प्रस्तुति को समग्र बनाने के लिए सभी पात्रों पर मेहनत की जानी चाहिये, नाटक में कुछ पात्र बिलकुल फ़्लैट ढंग से अपने सम्वाद बोलते दिखे बिना शरीर भाषा का इस्तेमाल किये. वैसे यह पहली  प्रस्तुति है और खामियां सुधारी जा सकती है.
नाटक का दृश्यबंध लगभग सादा है. एक प्लेटफार्म है जो अतीत का व्यंजक है जिससे निकल पात्र वर्तमान में हस्तक्षेप करते हैं. प्रस्तुति में तीन जादूगर सरीखे चरित्र हैं जो सूत्रधार का काम करते हैं वे नाटक के भीतर भी है और बाहर भी. वे आगे की कथा का संकेत देते है और टिपण्णी भी करते हैं. ये चरित्र रोचक हैं इनको और करियोग्राफ किया जाये तो बेहतर होगा. समग्रत: नाटक की शक्ति है की वह एक बहस को केंद्र में रखता है और उसका निर्वाह करता है. आगे नाटक और बेहतर और तीखा होता जाएगा ऐसी उम्मीद है. कुछ संवाद दिलचस्प है जीनमें एक है; ‘राजाओं से भी खतरनाक है नए विचार’. अतः उनकी ह्त्या कर दो पर विचार कि हत्या होती है क्या ?
नाटक-मैकबेथ मैकबेथ
समूह-संसप्तक
निर्देशन और आलेख-तोरित मित्रा

बुधवार, 29 सितंबर 2010

शकुंतला

कुटियाट्ट्म देखने की इच्छा कई दिनों से मन में थी, इसे देखने के अवसर हाथ से निकल जाते थे लेकिन इस बार मैं कोई चूक नहीं चाहता था. क्लास बीच में ही छोड कर रा. ना. वि. की ओर भागा. ठीक समय पर अभिमंच में था, सीट खोजी, बैठा. नाटक देखने में मैं अक्सर स्थान का खयाल अवश्य रखता हूं. प्रस्तुति ठीक समय पर शुरु हुई निर्देशक गोपाल वेणु के संक्षिप्त उदबोधन के साथ. अभिमंच पुरा भरा हुआ था, लोग दरवाजें पर खडे थे और नीचे भी बैठे हुए थे. नौ घंटे की लगातार प्रस्तुति वो भी शकुंतला की कुटियाट्ट्म शैली में. ऐसा लग रहा था कि हम ऐतिहासिक प्रक्रिया के अंश हैं.
कुटियाट्ट्म भारत की प्राचीनतम जीवित संस्कृत नाट्य परम्परा है. इसमें संस्कृत नाटकों का अनोखा प्रस्तुतीकरण का तत्व निहित है और साथ ही पारम्परिक हस्तमुद्राओं एवं मुख-भावाभिव्यक्तियों से संवरी एक उच्चकोटि और समग्र शैलीबद्ध रंगभाषा भी. इसका उद्गम केरल के राजा कुलशेखर वर्मन प्रथम के समय में हुआ था. कुटियाट्ट्म का शब्दिक अर्थ है ‘मिला जुला अभिनय’(परम्पराशील नाटक- जगदीशचंद्र माथुर). कुटियाटम के इतिहास पुरुष 'अम्मनुर माधव चाक्क्यार' ने इस नाट्य शैली को जीवित रखाने के लिये अपना अमूल्य योगदान दिया, इसे मंदिर से बाहर निकाल कर इसे विश्व भर के लोगों के लिये सुलभ कर दिया यद्यपि इसके विरोध भी हुए. इस नाट्य प्रस्तुति के निर्देशक 'गोपाल वेणु' 'अम्मनुर माधव चाक्कयार' के ही वरिष्ठ शिष्य हैं. वे पारम्परिक कलाओं के शोध एवं प्रदर्शन केन्द्र नटनाकेराली के संस्थापक और कुटियाट्ट्म के प्रशिक्षण केन्द्र अम्मनुर चाचु चाक्क्यार स्मारक गुरुकुल के सह संस्थापक भी हैं.
'शकुंतला' गोपाल वेणु के लम्बे शोध और अध्ययन का प्रतिफ़ल है. इस प्रक्रिया में उन्हें परम्परा प्रचलित अट्टप्रकारम (अभिनय सिद्धांत) और कर्मदीपिका (प्रस्तुति सिद्धांत) के साथ-साथ नया अभिनय सिद्धांत भी रचना पडा. कुटियाट्ट्म के प्रदर्शनों की दर्शकीय प्रतिक्रिया का भी ध्यान रखा गया. प्रस्तुति की अवधि नौ घंटे की है जिसमें पैंतालीस मिनट के दो अंतराल भी रखे गये हैं. अंतराल का समय भी नियोजित है. यह नाटक को तनाव के एक बिंदु पर ले जाकर छोड देता है. दर्शक इन अन्तरालों में अपने को फ़िर तरोताज़ा कर लेता है क्योंकि यह प्रस्तुति प्रेक्षक से एक विषेश प्रकार की उम्मीद भी रखती है.
'अभिज्ञान शाकुंतलम' कालिदास रचित भारतीय वांगमय का सर्वाधिक प्रतिष्ठित नाटक है. इसकी कथा ज्ञात ही है. प्रस्तुति की भाषा संस्कृत है. दर्शकों के लिये मंच के दोनों ओर उपशीर्षकों के प्रोजेक्सन लगाया गया था, वैसे इनके संयोजन में गडबडी थी. प्रस्तुति में अभिनय के सात्विक और कायिक पक्ष वाचिक और अहार्य के वनिस्पत अधिक मुखर हैं. वाचिक वहीं पर था जहां उसकी जरुरत थी, अधिकांश संवादों के लिये मुद्राओं और भंगिमाओ का सहारा लिया गया जो इन नाट्य शैलियों की विशिष्टता है.
कुटियाट्ट्म की प्रस्तुति दिये की रोशनी में ही होती है पर इस प्रस्तुति में रंग दीपन की आधुनिक तकनीक का कुशलता से प्रयोग किया गया था. प्रस्तुति मिढावु के पारंपरिक वादन और सुत्रधार के से मंगला चरण शुरु हुई. इसमें मंच को शुद्ध भी किया गया. ध्यात्वय हो कि कुटियाट्ट्म की प्रस्तुति की पृष्ठभूमि धार्मिक अनुष्ठान है. संगीत प्रस्तुति का सबसे जानदार पक्ष है. पात्रों के अभिनय के उतार चढ़ाव के साथ संगीत की संगत ने दर्शकों को रस सिक्त कराया . संगीत प्रस्तुति को तोडता भी है और उसमें सूत्र भी कायम रखता है. पात्रों के प्रवेश के चित्रपटी तकनीक का प्रयोग किया गया. पात्र का चित्रपटी के पीछे पहले पैर दिखता फ़िर सिर  का कुछ भाग फ़िर पुरा शरीर. पात्रों के प्रवेश की संस्कृत रंगमंच की यह प्राचीन परम्परा है. दर्शकों के कौतुहल और दृश्य को भव्य बनाने में ये तकनीक काफ़ी कारगर होती है. नाटक में ऐसे ही दुष्यंत की राज सभा का दृश्य भव्य हो गया था. लेकिन चित्र पटी हटाने में थोडा और समय लिया जाता तो बेहतर था. प्रस्तुति का सौंदर्य नाटक में तनाव के तीव्र क्षणों में अभिव्यक्त हुआ. दुष्यंत शकुंतला के प्रेम का आरंभ, शकुंतला की आश्रम से विदाई, दुष्यंत द्वारा अस्वीकार किये जाने पर शकुंतला का धरती में समा जाने का आग्रह इत्यादि दृश्य इस लिहाज़ से दर्शनीय थे. मछुआरे की भूमिका में गोपाल वेणु ने अपने अभिनय से दर्शकों को आनंदित किया. तनाव से भरे नाटक में राहत के ये कुछ पल थे. इस दृश्य में उन्होंने समकालीन देह भाषा को भी सहज रूप से कुटियाट्ट्म का अंग बना दिया गया था.पारम्परिक नाटकों की रूप सज्जा, वेष भूषा, गति अभिनय शैली और आलेख प्राय: निश्चित होते हैं, उनमे शैली के अनुसार बहुत अधिक परिवर्तन की गुंजाईश नहीं होती. कुटियाट्ट्म का प्रशिक्षण बाल्यवस्था से ही दिया जाता है ताकि अभिनेता अपने शरीर पर पूरा नियंत्रण कर लें. यह नियंत्रण प्रदर्शन के दौरान दिखता है जब अभिनेता अपने चेहरे के एक एक मांशपेशियों से मनचाहा काम लेतें हैं. नेत्र का इस्तेमाल तो चमत्कृत कर देना वाला है.
दरअसल, यह प्रदर्शन देखना ऐसा अनुभव है जिसे हम जीवन भर संजो कर रख सकते हैं और गर्व कर सकते हैं. उम्मीद भी कि ऐसी प्रस्तुतियां और भी देखने को मिलेंगी. गति के समय में ये प्रस्तुति हमें गति और ठहराव का अंतर बताती हुइ उसकी महत्ता समझाती है, हमारी धैर्य की परीक्षा लेती है क्योंकि हम तीव्रता के आदि हो गये हैं.


बुधवार, 15 सितंबर 2010

लिटिल बिग ट्रेजडीज

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल विदेश के ख्यात नाट्य निर्देशकों के साथ प्रस्तुत करता रहा है। इस कडी में उसने अभी ताज़ा प्रस्तुति की है,‘लिटिल बिग ट्रेज़डिज़’जो रुसी कवि एल्क्ज़ेंडर पुष्किन की कहानियों पर आधारित है। इसका निर्देशन किया है तुर्कमेनिस्तान के ‘ओअव्ल्याकुली खोद्जाकुली’ ने। खोदज़ाकुली तुर्कमेनिस्तान ड्रामा एंड म्युजिकल थियेटर के कला निदेशक रहे और रूस, उज़्बेकिस्तान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, उक्रेन व तुर्कमेनिस्तान के रंगमंच में सक्रिय रहें हैं। इससे पहले भी वे रा.ना.वि. तृतीय वर्ष के साथ किंग लियर की प्रस्तुति कर चुके हैं 2009 में। खोदजाकुली के कार्य में रंग परिकल्पना मुख्य है, वे अपनी प्रस्तुति  को इसी के इर्द गिर्द बुनते हैं। इस प्रस्तुति में भी आकर्षक दृश्यबंध बनाया गया है पर आलेख को समर्थन ना दे पाने की वज़ह से वह निस्तेज़ हो जाता है और उसका महत्त्व बस एक चमत्कार तक सीमित होकर रह जाता है। रंगमंच   चमत्कार के भरोसे नहीं किया जा सकता।
प्रस्तुति में तीन कहानियां हैं जिनका केन्द्र क्रमशः इर्ष्या, व्यभिचार और अहंकार हैं। ये मनुष्य की सहज प्रवृतियां हैं। पहली कहानी में एन्टोनियो सैलियरी प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा के अन्यायिक वितरण पर असंतोष करता है और अपने दोस्त मोज़ार्ट से इर्ष्या। इसी इर्ष्या के वशिभूत मोज़ार्ट को रोकने के लिये वह उसे ज़हर दे देता है। दूसरी कहानी डान जुआन की है जो एक विधवा से प्रेम करना चाहता है जिसके पति की भी हत्या उसने ही की है, ये अलग बात है कि वह अपनी अनुपस्थिति में अपने प्रेमिका के साथी को मार देता है. अपनी पहचान छुपाकर वह विधवा को प्रेम के लिये राजी कर लेता है पर पहचान अधिक देर तक छुपा नहीं पाता। विधवा डोन्या एना स्तब्ध रह जाती है और मृत्यु की कामना करती है। डान जुआन को विधवा के पति की आत्मा आकर दंडित करती है। तीसरी कहानी में प्लेग से ग्रस्त एक शहर में कुछ लोग कब्रिस्तान में प्लेग के सम्मान में जश्न मना रहें हैं और गीत गा रहें हैं। पादरी कब्रिस्तान में आकर शांति भंग करने के लिये उनको कोसता है। पादरी की बात सुनकर उस समूह का अध्यक्ष सोच में पड जाता है और उसके साथी जश्न मनाते रहते हैं।
तीनों कहानी में अलग अलग पात्र मुख्य भूमिका में हैं बाकी के पात्र कोरस की भुमिका निभाते हैं। पूरी प्रस्तुति के दौरान पात्र मंच पर ही रहते हैं। दृश्य बंध एक कैनोपी का है जिसके उपरी सिरे पर एक मुखाकृति है और वह प्लेटफ़ार्म से रस्सी से जुडा है। समस्त एक्शन इसी प्लेटफ़ार्म पर होता है। इसके पीछे कि हिस्सों को ढक दिया गया जो नेपथ्य का कार्य करता है। प्रकाश और तकनीक के सहारे यह दृश्य बंध नाटक में कुछ जगह पर चौंकाता है पर उसका साम्य आलेख से नहीं बन पाता। किंग लियर की प्रस्तुति के दौराम खोदजाकुली ने तंबु और रस्सी के सहारे कल्प्नाशील दृश्यबंध रचा था जो सादगी के साथ आलेख को आधार देता था और अभिनेताओं की गति इस दृश्यबंध के अनुकुल हो गयी थी। इस प्रस्तुति में अभिनेताओं की देहगति के साथ संवाद की और दृश्यबंध की संगति नहीं बन पाती, जो प्रस्तुति को उबाउ बना देती है। पहली कहानी संक्षिप्त है पर बाकी की दो अनावश्यक रूप से लम्बी हैं। काजल घोष का संगीत प्रस्तुति का उल्लेखनीय पक्ष है जिसे उन्होंने थाल, गिलास, कंचे की धवनियों से तैयार किया है। पुश्किन की एक कविता को भी प्रस्तुति में शामिल किया गया है पर वह भी प्रभावित नहीं करती। संगति के अभाव में कहानियों का मूल कथ्य दबा ही रह गया है और ब्रोश्योर आप ना पढें तो आपको हो सकता है पता भी ना चले।
विदेशी निर्देशकों के आगमन को रंगमंच उत्सुक निगाहों से देखता है। इससे पहले कार्ल वेबर. पीटर ब्रुक और फ़्रित्ज़ बेनेवित्ज़ जैसे निर्देशकों के आगमन ने रंगमंच को एक उर्जा प्रदान की थी। यह प्रस्तुति रंगमंच को कहीं लेकर नहीं जाती बल्कि उसे विभ्रम में छोड जाती है।एक बात तो रेपर्टरी को तय कर लेना चाहिये कि उसे प्रयोगधर्मी प्रस्तुतियां करते वक्त दर्शकों को भी ध्यान में रखना चाहिये। प्रस्तुति के निस्तेज होने का कारण यह भी है कि निर्देशक और अभिनेता के बीच संवाद का माध्यम दुभाषिया है और खबर यह भी है कि रंगमंडल के कुछ अभिनेता इस प्रस्तुति से संतुष्ट नहीं थे। गौरतलब है कि ये प्रस्तुति आगामी राष्ट्रमंडल खेलों के लिये तैयार किये गये हैं जिसमें आगे रंगमंडल की कुछ और प्रस्तुतियां होंगी और पूर्वोत्तर का नाट्य उत्सव इसी सिलसिले में सम्पन्न हुआ है।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

बीच शहर में

रंगमंच पर इन दिनों कुछ नई प्रवृतियां विकसित हो रहीं हैं. एक तो पारस्परिक सहयोग का जिसके तहत अभिनेता, नाट्य संगठन, संसथान और निर्देशक मिल कर प्रस्तुति दे रहें हैं. दूसरी प्रवृति है नाटक को विकसित करने की. इसमें नाटक के लिये कोइ एक थीम चुन कर उसका विकास इम्प्रोवाइजेशन और कार्यशाला के द्वारा किया जा रहा है। इस तरह तैयार नाटक का लिखित आलेख तैयार कर लिया जाता है फ़िर उसकी प्रस्तुति होती है। इस तरह के रंगमंच में अभिनेता केन्द्र में आ गया है और निर्देशक प्रस्तुति का नियंत्रक हो गया है। इसी तरह की एक प्रस्तुति ‘बीच सहर में’ 17 और 18 जुलाई को रा.ना.वि. में हुआ। अलरिप्पु (ALARIPPU) और रा.ना.वि. के साझे से तैयार इस प्रस्तुति का निर्देशन किया त्रिपुरारी शर्मा और अदिति विश्वाश ने.

नई दिल्ली और गुजरात दंगो के परिप्रेक्ष्य में समाज में फ़ैलते जा रहे साम्प्रादायिक असहिष्णुता को नाटक ने अपना विषय बनाया था। इस क्रम में उसने समाज के हिस्सों में बटते जाने को भी चित्रित किया। एक पक्ष जो बिलकुल अंधा होकर हिंसा में अपना योगदान करता है और दूसरा जिसमें यह चेतना अभी बाकी है कि जिन लोगों के साथ वो रह रहें हैं उनको बचाया जाना जरूरी है चाहे वह किसी कौम के हों। इसी विचार के तहत नाटक एक ऐसे साधारण आदमी के असाधारण प्रयास को प्रदर्शित करता है जो अपने परिवार की मदद से गुजरात दंगे में 70 आदमी की जान बचाता है. साथ ही चार महिने तक सरंक्षण और आश्रय प्रदान करता है। जाहिर है दंगाईयों के लिये यह एक अविश्वनीय घटना है।

इस को प्रस्तुत करने के क्रम में नाटक सरंक्षकों और दंगाईयों दोनों के पक्ष को प्रस्तुत करता है. स्मृतियों, बिंबों, नाटक के भीतर नाटक के जरिये प्रस्तुति को तैयार किया गया है. बचाने वाले की खुशी और दंगाईयों की निराशा और हिंसक प्रवृति को नाटक में खास तौर पर उभारने का प्रयास किया गया है. यथार्थ और स्वप्न, जीवित और मृत पात्रों को एक ही स्पेस का हिस्सा बनाने से समाज का अंतर्विरोध उजागर हुआ है. प्रस्तुति के लिये मंच पर प्रापर्टी के रूप में लकडी के बक्सो, फ़्रेम और ट्राली का उपयोग है. मंच के पीछे चित्रित पर्दों को (धुसर रंग के खंडहरों जिन पर खुन के छींटे परे है) लगाया गया है. दृश्यबंध हिंसा के बाद के अवसाद को उभारता है. संगीत ठीक है पर पात्रों का गायन कभी कभी अति नाटकीय हो जाता है.

प्रस्तुति शुरुआत में उबाउ है लेकिन मूल विषय पर आते ही गम्भीर हो गयी है. संभवतः प्रस्तुति अभी विकासशील अवस्था में है और इस पक्ष पर काम किये जाने की जरूरत है. नाटक का कथ्य अत्यंत संवेदनशील है जो असहिष्णु होते जा रहे समाज में एक ‘आदमी’ के बचे रहने को दिखाता है. अतः प्रस्तुति में आगे काफ़ी सम्भावनायें हैं. कुछ अभिनेताओं ने उम्दा अभिनय किया है पर कुछ काफ़ी कमजोर हो गये जिससे प्रस्तुति में संतुलन नहीं आता.

मंगलवार, 25 मई 2010

बेगम का तकिया

 
रा.ना.वि. रंगमंडल का ग्रीष्मकालीन नाट्य समारोह शुरु हो चुका है। रंजीत कपूर निर्देशित ‘बेगम का तकिया’ के साथ। इससे पहले भी रंजीत कपूर रंगमंडल के साथ ही 1978 में इस नाटक को कर चुके हैं सुरेखा सीकरी, रघुवीर यादव, राजेश विवेक इत्यादि कलाकारों के साथ। उस समय भी यह नाटक अत्यंत लोकप्रिय हुआ था और काफ़ी सराहना भी इसे मिली थी। रंजीत कपूर के रंगकर्म के दिशा निर्धारण में भी इस नाटक की मुख्य भूमिका रही है। समय चक्र घुमा है इसी नाटक से उन्होंने रंगमंच में वापसी की है और इतिहास को दुहराया है[1]। (और यह दुहराव ना त्रासदी है ना व्यंग्य)
‘बेगम का तकिया’ पंडित आनंद कुमार के उपन्यास पर आधारित है, नाट्यालेख स्वंय निर्देशक ने तैयार किया है। कहानी ईमानदारी के भोलेपन और बेईमानी के चालाकीपन की है। पीरा और मीरा दो भाइ मजदूरी करते हैं, फ़कीर दरियाशाह पीरा को उनके लिये तकिया बनाने का काम सौंपते हैं। पीरा स्वंय और अपने तबके के लोगों को आधी मजदूरी पर काम करने के लिये तैयार कर लेता है। फ़ाका करने से बेहतर स्थिति है यह। वहीं काम करते करते
मीरा को एक गडा हुआ खजाना मिलता है  और वह उसे चुपचाप लेकर शहर  चला जाता है इधर पीरा उसके लिये परेशान है। एक दिन वह सौदागर अमीर शाह बन कर  अपनी बेगम उनके चचा और साले के साथ लौटता है। पीरा की शादी होती है वह खर्च करने के लिये अपने भाइ से रुपये उधार लेता है। बीवी के आते ही दोनों औरतों में झगडा होता है। मीरा की बीवी अपने पैसे वापस मागती हैं, पीरा की बीवी पीरा को ताने दे कर उसे परदेश जाने को विवश कर देती है। पीरा तकिया बनाने का जिम्मा सर्फ़ु को सौंप कर चला जाता है। परदेश से वापस लौटने पर वह पाता है कि तकिये की जगह पर सर्फ़ु रहने लगा है और तकिये का काम बंद पडा है, इधर उसकी बीवी को  बच्चा भी हुआ है। खुश पीरा दरिया शाह की तकिया बनवाना फ़िर शुरु करता है लेकिन मीरा की बीवी वहीं पर अपना महल बनवाना चाहती है। विवाद में पीरा के बच्चे की जान चली जाती है और वह दरियाशाह को ढूंढने निकल पडता है। उसे पता चलता है कि दरियाशाह उसी के घर में  कारीगर का वेश बदल कर रह रहे थे और उन्होंने  ही मीरा का महल तैयार किया है। अंत में गांव वाले मीरा की बेगम और उसके रिश्तेदार को भगा देते हैं और दरियाशाह उस महल को ‘बेगम का तकिया’ नाम दे देते हैं और पीरा को उसके सारे दरवाजे तोड डालने के लिये कह देते हैं। ताकि हर कोई उसमें आ सके और हर ओर की हवा ले सके।
मंचन के लिये विद्यालय परिसर में ही मुक्ताकाशी रंगमंच तैयार किया गया है। महल और झोपडी दो कोनों पर स्थित हैं जो मीरा और पीरा के जीवन के वैषम्य को दर्शाते हैं। बीच में पेड के नीचे दरियाशाह का आसन है जहां पर तकिया बनाया जाना है। उसके आगे  चौपाल जैसा बनाया गया है जिस पर गांव वालों की पंचायत जमती है और गाना बजाना होता है। मंच सज्जा काफ़ी सुनियोजित है कुछ भी फ़ालतु नहीं है। गीत संगीत प्रस्तुति को और दमदार बनाते हैं। एक तरफ़ वे तनाव के माहौल से राहत देते हैं तो दूसरी तरफ़ नाटक के दर्शन को भी व्यक्त कर देते हैं, बाहर से सब मीठ्ठे बोले अंदर से बेईमाना देखा
प्रस्तुति भावपुर्ण है और दशक को जोड लेता है। कुछ दृश्य बडे ही उम्दा बन पडे हैं जैसे कि पीरा और मीरा की बीवियों के झगडे का और बेटे के लिये विलाप करते पीरा और उसकी पत्नी का। अभिनेताओं का अभिनय भी अच्छा है। मीरा ( पूंज प्रकाश)  की चालाकी और भाई के प्रति प्रेम भाव , पीरा  की निर्दोष सज्जनता, बुंदु चचा (द्वारका दाहिया) की बुजुर्गीयत, अल्लाबन्दे ( अनुप त्रिवेदी) का काइंयापन, मीरा की बीवी (साज़िदा) की हेठी और पीरा की बीवी( राखी कुमारी) की कर्मठता को अभिनेताओं ने सजीव कर दिया है। मीरा की बीवी रौनक के किरदार में साज़िदा ने अपने तलफ़्फ़ुज़ और देह भाषा से प्राण भर दिया है। नाटक का खल चरित्र होने के बाद भी दर्शक की वह प्रिय हो जाती है।
दरियाशाह (नवीन सिंह ठाकुर) का ही अभिनय प्रशंसनीय है जो कतरा शाह से जीवन के रहस्यों और प्रश्नों पर विचार करते रहते हैं। इन पात्रों के नाम भी गौर करने लायज हैं – दरिया और कतरा। नाटक का दर्शन है कि अगर आदमी स्वंय इमानदार रहे और दूसरे से इमानदारी रखे तो सब कुछ ठीक हो जाये। पर ऐसा होना संभव कहां हैं। उत्तर आधुनिक अवसरवादिता के दौर में पीरा की निर्दोष सज्जनता बेवकुफ़ी का पर्याय है।
प्रस्तुति में रंजीत कपूर के निर्देशन की विशेषतायें मौजूद हैं मनोरंजन भी  और दर्शन भी।
सभी प्रमुख काव्य शास्त्रियों ने भी नाटक का उद्देश्य  आनंद और शिक्षा माना है। शिक्षा वैसी जो आनंद में लिपटकर आये। कोरा उपदेश कौन सुनना चाहता है।
प्रस्तुति का कमजोर पक्ष उसका अंत है। नाटक का  क्लाइमेक्स काफ़ी जल्दीबाजी में हो जाता है। खुले रंगमंच के नीचे ऐसा नाटक देखना जिसकी  प्रस्तुति में खुलापन और सरंचना में गहराई हो , काफ़ी आनंददायक है।


[1] ब्रोश्योर देखें

मंगलवार, 23 मार्च 2010

रंगमंच पर स्त्री छवि


रंगमंच पर स्त्री छवि
महिला  रंगकर्मियों की रंगमंच पर एक सार्थक उपस्थिति रही है। खास कर स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक रंगमंच पर, वरन अपने आरंभिक युग में पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते रहे। फ़िर समाज में हाशिये पे रहने वाली जाति बेडिन की महिलओं ने और बदनाम ईलाके की महिलाओं ने  में रंगमंच पर पदार्पण किया, धीरे धीरे भद्र महिलाएं भी इस  क्षेत्र में आ गयी।
अभी हाल ही में दिल्ली में महिला केन्द्रित दक्षिण एशिययाइ नाट्य समारोह का आयोजन किया गया। इस नाट्योत्सव की थीम थी स्त्री और नाम था लीला। महि्ला केन्द्रित नाट्यआलेख, महिला निर्देशक और महिला अभिनेत्रियों के काम का प्रदर्शन किया गया। भारत के अलावा, बांग्लादेश, पकिस्तान, मालदीव, अफ़गानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका इत्यादि दक्षिण एशियाई देशों ने शिरकत की। उदघाटन अमाल अल्लाना द्वारा निर्देशित नाटक नटी विनोदनी से हुआ। यह प्रस्तुति पिछले कुछ वर्षों मे कफ़ी चर्चा बटोर चुकी है। यह अभिनेत्री बिनोदिनी के आत्मकथा अमरकथा पर आधारित है, यह एक महिला के सार्वजनिक जीवन में उतरने और  स्वतंत्रता और पहचान को प्राप्त करने का साहसिक प्रयास है। जन्म से वेश्या बिनोदिनी, कोलकात्ता के रंगमंच पर अभिनय करने वाली पहली महिला थी, जिसने सफ़लता की उंचाइयां भी पायी। मंच पर जीवन के समानांतर उसके जीवन के अनुभव कैसे उसके अभिनय में सहायक बने, समाज के उच्च वर्णों द्वारा कैसे उसका शोषण किया गया, यह नाटक इसी की कहानी कहता है। नाटक में वृद्ध बिनोदिनी को सब कुछ याद करते हुए दिखाया गया है, यह स्मृतियां एकाग्र रूप में ना आकर के टुकडो टुकडों में आती है। बिनोदिनी के विभिन्न अवस्थाओं को अलग अलग पात्रों ने जीया है। इससे उसके अंतर्द्वंद्वं को उभारने में सहायता मिली है।  मंच सज्जा में सफ़ेद विंग्स और प्लेटफ़ार्म का इस्तेमाल किया गया है। यह विंग्स चलायमान थे और इन पर प्रोजेक्टर के सहारे, महल, स्टेज, घर और बाग का इच्छित दृश्यबंध बना लिया जाता था। निसार अल्लाना की इस मंच सज्जा के साथ साथ नाट्क की वेश-भुषा भी काफ़ी आकर्षक थी। सभी अभिनेत्रियों ने अपनी भूमिकाएं अच्छी तरह से निभाई थी।
सकुबाई, नादिरा जहीर बब्बर द्वारा निर्देशित एकजुट की प्रस्तुति थी। इस  एकल अभिनय में सरिता जोशी ने कमाल कर दिया था। पूरे डेढ  घंटे दर्शक उनके अभिनय को मंत्रमुग्ध हो देखते रहे। इस  नाटक में मुम्बई की चाल में रहने वाली सकुबाइ फ़्लैट और अपार्टमेंट में रहने वाले समुदाय, जिनके यहां वह काम करती है, के जीवन के अंतर्विरोधों को उजागर करती है। यह विपन्न स्त्री की निगाह है जिसका अपना घर बारिश में भीग रहा है और वह दूसरे का घर ठीक कर रही है। वह  अमीर बच्चे के पीछे पीछे दु्ध लेकर भागती है और उसके बच्चे एक ब्रेड के लिये टूट पडते हैं। उसे सबसे आश्चर्य होता है कि आजकल पढे लिखे और अनपढ भी घर घर घुमते है। उसका अपना जीवन कई कडवी स्मृतियों से भरा है पर वह जीवन का रस लेना जान गयी है। एक  उच्च मध्यवरगीय घर के अंदरूनी हिस्से की तरह दृश्यबंध को यथार्थवादी रूप दिया गया था।  उसी के भीतर गति करते हुए सकुबाई के रूप में सरिता जोशी ने  दो स्तरों के बीच की खाई को उजागर किया था। यह प्रस्तुति निस्संदेह सरिता जोशी के लिये याद रह जायेगी।
  पाकिस्तान की सीमा किरमानी चरचित निर्देशिका है,  अरिस्तोफ़ेनिस के नाट्क लिस्स्ट्राटा  का रुपांतरण जंग अब नहीं होगी के नाम से ले कर आयी थी। इस नाटक में दो कबीले खुबैनी और फ़ुलमांछी की औरतें जो जंग से आजीज आ चुकी है, निर्णय लेती है कि वे अपने पति से दूर रहेंगी और कबिले के खजाने पर कब्जा कर लेती है। इस घटना से सभी मर्द नाराज होते हैं पर सभी औरतें एकत्र होकर  उनका सामना करती हैं और उन्हे घुटने टेकने पर मजबूर करती हैं। दोनों कबीलों मे समझौता होता है कि अब जंग नहीं होगी। औरते अपने दानिश मंदी से जंग को हमेशा के लिये टाल देती हैं। एक सादे रंगमंच पर देह गतियों और गीत संगीत के जरि्ये यह प्रस्तुति अपना आकार लेती है। प्रकाश और ध्वनि प्रभाव भी इस नाटक के प्रभाव को उभारते है खासकर प्रकाश परिकल्प्ना काफ़ी कल्पनाशील है। प्रस्तुति के दौरान नाटक धीरे धीरे समसामयिक हो जाता है दोनों कबिले भारत और पाकिस्तान का रूप ले लेतें हैं। इनका अतीत एक है, आजादी की लडाई उन्होंने साथ लडी है, पर अब एक दूसरे से लड रहें हैं। औरतों को इस जंग में सबसे अधिक नुकसान उठाना पड रहा है इसलिये औरते कदम बढाती हैं और जंग को रोकने की पहल करती हैं।
सावित्री देवी भारतीय रंगमंच पर समकालीन श्रेष्ठ अभिनेत्रियों में से एक है। कन्हाईलाल की प्रस्तुति द्रोपदी में उनकी अभिनय क्षमता का रूप देखने को मिलता है। सैनिक दमन और अत्याचार के विरोध में सक्रिय द्रोपदी के पति को उसी के एक साथी के कारण सैनिक मार देते हैं। संघर्ष का बीडा उठाये द्रोपदी पकडी जाती है और उसका बलात्कार होता है। मंच पर दर्शकों और सैनिको के समने वे निर्वस्त्र होती है तो प्रतीत होता है कि हम खुद  नंगे हो गयें हैं।  कन्हाईलाल के प्रदर्शन की खासीयत इसमें मौजुद हैं। सादे रंगमंच और अभिनेता की देह गाति के द्वारा ही दृश्यबंध का निर्माण शैली बद्ध अभिनय और प्रकाश का उपयोग। यह नाटक पूरे पूर्वोत्तर में चल रहे सैनिक दमन के विरोध की प्रेरणा प्रदान करता है। सैनिकों के बधन में फ़ंसी सावित्री की कसमसाहट और चेहरे का तनाव सब कुछ उल्लेखनीय है। सावित्री अभिनय के दौरान अपनी एक एक मांशपेशियों से काम लेती हैं। सारा दमन और प्रतिरोध हम एक साथ उनके चेहरे पर देखते हैं।
 अपने द्वारा देखी गयी इन प्रस्तुतियों की कुछ बातें उजागर कर दूं;
 इन सारी प्रस्तुतियों में हाशिये की स्त्री और उनकी आंखों से समाज के चरित्र का चित्रण किया गया है।
 औरतें अब चूप रहने वाली नहीं हैं वो मर्दों के बिना रहना जान गयी हैं, वक्त आने पर वह ने्तृत्व भी कर सकती है,और मर्दों से मुकाबला भी।
 लगातार दमित होने के अभिशाप से उबरने के लिये अब नारियों को ही आगे आना होगा और अपने दमन का सक्रिय प्रतिरोध करना होगा।
 और सबसे महत्त्वपूर्ण की जिस सभ्यता को मर्दों ने लहुलुहान कर दिया है उसकों बचाने और सुधारने की जिम्मेदारी महिलाओं को ही उठानी होगी।
यही इस लीला का सार है।