IPL-क्रिकेट
IPL -3 समाप्त हो गया। इस तीन साल में इसे तीन विजेता मिले। कागज पर मजबुत दिखने वाली टीम हारती रहीं और तथाकथित कमजोर टीमों ने बाजी मारी । इसी साल मुम्बई इंडियन्स विजेता के तौर पर उभरा और उसके प्रदर्शन में निरंतरता रहीं, किसी ने सोचा नहीं था कि चेन्नई सुपर किंग्स फ़ाइनल में पहूंचेगी और मुम्बई इंडियन्स से कप छीन लेगी ।
खैर, मेरा कहना कुछ और ही है क्योंकि IPL जब से शुरु हुआ है तबसे वह अन्य कारणों को लेकर अधिक चर्चा में रहा है।
IPL में शुरुआती चर्चा खिलाडियों की नीलामी को लेकर हुई। क्रिकेट के मैदान में गेंद पर बल्ले से प्रहार करते और बल्ले को छकाकर विकेट उखाडते खिलाडी सब्जी के भाव बिकने को बाध्य हुए। कमतर खिलाडी उंचे दामों पर बिके और बेहतर खिलाडी नीचे दामों पर। रिकी पोंटींग इसके सबसे उम्दा उदाहरण थे।
पहले IPL के प्रारंभ होतें ही अर्धनग्न नाचती चीयर लीडर्स को लेकर बवाल मच गया। भारतीय परम्परा का हनन मानते हुए इसे लेकर संसद में भी सवाल उठा, नतिजतन चीयर लीडर्स को अधिक कपडे पहनने को बाध्य होना पडा।
दूसरे IPL के समय सरकार ने आमचुनावों को ध्यान में रखते हुए IPL को सुरक्षा उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया। कमिशनर ललित मोदी इसे दक्षिण अफ़्रिका ले गये। अब ये विवाद हुआ कि क्या यह वाकई इंडियन प्रीमियर लीग ही है? कुछ को लगा कि इससे समस्त विश्व में संदेश जायेगा कि भारत सूरक्षित जगह ही नहीं है।
इसी जगह ललित मोदी के विदेशी महिला से सांठ गांठ हुए जिसका वीजा रोकने के लिये उन्हें शशि थरुर से बात करनी पडी। इस IPL में सौरेभ गांगुली को कोलकाता टीम की कप्तानी से हटाया गया। बुचनैन से विवाद हुआ। और अनेक कर्मकांड के बाद भी कोलकाता निचले स्थान पर रही।
तीसरा IPL व्यावसायिक दृष्टि से जितना सफ़ल रहा विवादों के लिहाज से भी उतना ही गर्म। पुणे और कोच्ची फ़्रेंचाईजी की बिक्री के बाद भूचाल हो गया। मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया। शशि थरुर को अपना मंत्री पद गंवाना पडा और ललित मोदी् भी संभवतः IPL कमिशनर के पद से हाथ धोने जा रहें हैं। मैच के बाद होने वाली पार्टियों के बार में कहा जा रहा है कि यहां ड्रग का इस्तेमाल हो रहा है। इस IPL में हो रहे धनवृष्टि को देखते हुए सरकार ने इसकी ओर ध्यान दिया है और अब यह तमाम जांच एजेंसियों के घेरे में है। वैसे इसके भी राजनीतिक निहितार्थ हैं।
IPL शुरु होने से पहले ही पाकिस्तानी खिलाडियों को किसी भी टीम में ना लिये जाने ने भी विवाद खडा किया था।
IPL से जुडी खास बात चिंतनीय यह है कि ग्लैमर और पैसे ने क्रिकेट और क्रिकेटर को पीछे धकेल दिया है। अब ललित मोदी गौतम गंभीर जैसे खिलाडी को अपमानित करते हैं और रविन्द्र जडेजा को इसलिये प्रतिबंधित करते हैं कि उसने इस बाजार में अपनी कीमत खुद तय करने की कोशिश या हिम्मत कह लिजिये, की । पिछले IPL में कैफ़ जैसे खिलाडी को वापस भेज दिया गया, सौरभ गांगुली को अपमानित करके कप्तानी से हटाया गया।
IPL से जुडा तर्क यह भी है कि इसने कई नये खिलाडियों को उभरने का मौका दिया है। अखबार की रिपोर्ट यह बताती है कि कई उभरते खिलाडी बेंच पर बैठे रह जाते हैं और उन्हें एक भी मैच खेलने का मौका नहीं मिलता। इसने खिलाडियों की खलेन की उम्र और कंसिस्टेंसी भे कम कर दी है। कई कई देश के खिलाडियों ने एक साथ सन्यास लेकर टीम को मुश्किल मेंडाल दिया है।
IPL में उभरने वाले खिलाडियों को राष्ट्रीय तीम में भी जगह नहीं मिल पा रही है। इस बार IPL विश्व कप के लिये जो भारतीय टीम चुनी गयी है उससे इस IPL के सभी सफ़ल खिलाडी बाहर हैं। जैसे सबसे सफ़ल बल्लेबाज सचिन और गेंदबाज प्रग्यान ओझा। युवराज सिंह , पीयुष चावला जो टीम में हैं वो पूरे IPL के दौरान असफ़ल रहें हैं। कहा जा रहा है कि IPL की कमाई कि क्रिकेट के विकास पर खर्चा जायेगा पर स्टेट बोर्डों को मिलने वाला हिस्सा काफ़ी कम है।
IPL से जुडा मोदी का दावा है कि यह उनका सपना है। परंतु अगर सुभाष चंद्रा की ICL नहीं होती तो क्या IPL होता ?
अगर IPL को विश्व के सफ़ल स्पोर्ट्स लीग चैम्पियन्स लीग और एन. बी. की टक्कर का बताया जा रहा है तो इसे इनके जैसा बनाने के लिये ध्यान भी देना होगा। क्रिकेट को व्यावसायिकता के उपर तरज़ीह देनी होगी क्योंकि क्रिकेट है तभी IPL है और कमाई भी है।
सोमवार, 26 अप्रैल 2010
मंगलवार, 23 मार्च 2010
रंगमंच पर स्त्री छवि
रंगमंच पर स्त्री छवि
महिला रंगकर्मियों की रंगमंच पर एक सार्थक उपस्थिति रही है। खास कर स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक रंगमंच पर, वरन अपने आरंभिक युग में पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते रहे। फ़िर समाज में हाशिये पे रहने वाली जाति बेडिन की महिलओं ने और बदनाम ईलाके की महिलाओं ने में रंगमंच पर पदार्पण किया, धीरे धीरे भद्र महिलाएं भी इस क्षेत्र में आ गयी।
अभी हाल ही में दिल्ली में महिला केन्द्रित दक्षिण एशिययाइ नाट्य समारोह का आयोजन किया गया। इस नाट्योत्सव की थीम थी स्त्री और नाम था लीला। महि्ला केन्द्रित नाट्यआलेख, महिला निर्देशक और महिला अभिनेत्रियों के काम का प्रदर्शन किया गया। भारत के अलावा, बांग्लादेश, पकिस्तान, मालदीव, अफ़गानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका इत्यादि दक्षिण एशियाई देशों ने शिरकत की। उदघाटन अमाल अल्लाना द्वारा निर्देशित नाटक नटी विनोदनी से हुआ। यह प्रस्तुति पिछले कुछ वर्षों मे कफ़ी चर्चा बटोर चुकी है। यह अभिनेत्री बिनोदिनी के आत्मकथा अमरकथा पर आधारित है, यह एक महिला के सार्वजनिक जीवन में उतरने और स्वतंत्रता और पहचान को प्राप्त करने का साहसिक प्रयास है। जन्म से वेश्या बिनोदिनी, कोलकात्ता के रंगमंच पर अभिनय करने वाली पहली महिला थी, जिसने सफ़लता की उंचाइयां भी पायी। मंच पर जीवन के समानांतर उसके जीवन के अनुभव कैसे उसके अभिनय में सहायक बने, समाज के उच्च वर्णों द्वारा कैसे उसका शोषण किया गया, यह नाटक इसी की कहानी कहता है। नाटक में वृद्ध बिनोदिनी को सब कुछ याद करते हुए दिखाया गया है, यह स्मृतियां एकाग्र रूप में ना आकर के टुकडो टुकडों में आती है। बिनोदिनी के विभिन्न अवस्थाओं को अलग अलग पात्रों ने जीया है। इससे उसके अंतर्द्वंद्वं को उभारने में सहायता मिली है। मंच सज्जा में सफ़ेद विंग्स और प्लेटफ़ार्म का इस्तेमाल किया गया है। यह विंग्स चलायमान थे और इन पर प्रोजेक्टर के सहारे, महल, स्टेज, घर और बाग का इच्छित दृश्यबंध बना लिया जाता था। निसार अल्लाना की इस मंच सज्जा के साथ साथ नाट्क की वेश-भुषा भी काफ़ी आकर्षक थी। सभी अभिनेत्रियों ने अपनी भूमिकाएं अच्छी तरह से निभाई थी।
सकुबाई, नादिरा जहीर बब्बर द्वारा निर्देशित एकजुट की प्रस्तुति थी। इस एकल अभिनय में सरिता जोशी ने कमाल कर दिया था। पूरे डेढ घंटे दर्शक उनके अभिनय को मंत्रमुग्ध हो देखते रहे। इस नाटक में मुम्बई की चाल में रहने वाली सकुबाइ फ़्लैट और अपार्टमेंट में रहने वाले समुदाय, जिनके यहां वह काम करती है, के जीवन के अंतर्विरोधों को उजागर करती है। यह विपन्न स्त्री की निगाह है जिसका अपना घर बारिश में भीग रहा है और वह दूसरे का घर ठीक कर रही है। वह अमीर बच्चे के पीछे पीछे दु्ध लेकर भागती है और उसके बच्चे एक ब्रेड के लिये टूट पडते हैं। उसे सबसे आश्चर्य होता है कि आजकल पढे लिखे और अनपढ भी घर घर घुमते है। उसका अपना जीवन कई कडवी स्मृतियों से भरा है पर वह जीवन का रस लेना जान गयी है। एक उच्च मध्यवरगीय घर के अंदरूनी हिस्से की तरह दृश्यबंध को यथार्थवादी रूप दिया गया था। उसी के भीतर गति करते हुए सकुबाई के रूप में सरिता जोशी ने दो स्तरों के बीच की खाई को उजागर किया था। यह प्रस्तुति निस्संदेह सरिता जोशी के लिये याद रह जायेगी।
पाकिस्तान की सीमा किरमानी चरचित निर्देशिका है, अरिस्तोफ़ेनिस के नाट्क लिस्स्ट्राटा का रुपांतरण जंग अब नहीं होगी के नाम से ले कर आयी थी। इस नाटक में दो कबीले खुबैनी और फ़ुलमांछी की औरतें जो जंग से आजीज आ चुकी है, निर्णय लेती है कि वे अपने पति से दूर रहेंगी और कबिले के खजाने पर कब्जा कर लेती है। इस घटना से सभी मर्द नाराज होते हैं पर सभी औरतें एकत्र होकर उनका सामना करती हैं और उन्हे घुटने टेकने पर मजबूर करती हैं। दोनों कबीलों मे समझौता होता है कि अब जंग नहीं होगी। औरते अपने दानिश मंदी से जंग को हमेशा के लिये टाल देती हैं। एक सादे रंगमंच पर देह गतियों और गीत संगीत के जरि्ये यह प्रस्तुति अपना आकार लेती है। प्रकाश और ध्वनि प्रभाव भी इस नाटक के प्रभाव को उभारते है खासकर प्रकाश परिकल्प्ना काफ़ी कल्पनाशील है। प्रस्तुति के दौरान नाटक धीरे धीरे समसामयिक हो जाता है दोनों कबिले भारत और पाकिस्तान का रूप ले लेतें हैं। इनका अतीत एक है, आजादी की लडाई उन्होंने साथ लडी है, पर अब एक दूसरे से लड रहें हैं। औरतों को इस जंग में सबसे अधिक नुकसान उठाना पड रहा है इसलिये औरते कदम बढाती हैं और जंग को रोकने की पहल करती हैं।
सावित्री देवी भारतीय रंगमंच पर समकालीन श्रेष्ठ अभिनेत्रियों में से एक है। कन्हाईलाल की प्रस्तुति द्रोपदी में उनकी अभिनय क्षमता का रूप देखने को मिलता है। सैनिक दमन और अत्याचार के विरोध में सक्रिय द्रोपदी के पति को उसी के एक साथी के कारण सैनिक मार देते हैं। संघर्ष का बीडा उठाये द्रोपदी पकडी जाती है और उसका बलात्कार होता है। मंच पर दर्शकों और सैनिको के समने वे निर्वस्त्र होती है तो प्रतीत होता है कि हम खुद नंगे हो गयें हैं। कन्हाईलाल के प्रदर्शन की खासीयत इसमें मौजुद हैं। सादे रंगमंच और अभिनेता की देह गाति के द्वारा ही दृश्यबंध का निर्माण शैली बद्ध अभिनय और प्रकाश का उपयोग। यह नाटक पूरे पूर्वोत्तर में चल रहे सैनिक दमन के विरोध की प्रेरणा प्रदान करता है। सैनिकों के बधन में फ़ंसी सावित्री की कसमसाहट और चेहरे का तनाव सब कुछ उल्लेखनीय है। सावित्री अभिनय के दौरान अपनी एक एक मांशपेशियों से काम लेती हैं। सारा दमन और प्रतिरोध हम एक साथ उनके चेहरे पर देखते हैं।
अपने द्वारा देखी गयी इन प्रस्तुतियों की कुछ बातें उजागर कर दूं;
इन सारी प्रस्तुतियों में हाशिये की स्त्री और उनकी आंखों से समाज के चरित्र का चित्रण किया गया है।
औरतें अब चूप रहने वाली नहीं हैं वो मर्दों के बिना रहना जान गयी हैं, वक्त आने पर वह ने्तृत्व भी कर सकती है,और मर्दों से मुकाबला भी।
लगातार दमित होने के अभिशाप से उबरने के लिये अब नारियों को ही आगे आना होगा और अपने दमन का सक्रिय प्रतिरोध करना होगा।
और सबसे महत्त्वपूर्ण की जिस सभ्यता को मर्दों ने लहुलुहान कर दिया है उसकों बचाने और सुधारने की जिम्मेदारी महिलाओं को ही उठानी होगी।
यही इस लीला का सार है।
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
लोकगीतों के पन्ने
मैंने अपने ब्लॉग में बताया था की मै अपनी मम्मी की डायरी ले के आया हूँ उसमे मिथिलांचल में होने वाले हर आयोजन सम्बन्धी गीत है यानी संस्कार गीत . पिछले दिनों मैंने उसमे से भगवती गीत ब्लॉग पर प्रकाशित किया था ,उसी कड़ी में इस बार मै सोहर पोस्ट कर रहा हूँ. सोहर वैसे गीत होते है जो संतान जनम के समय या उसके बाद गाये जाते हैं. तो पेश है श्रीमती रीता मिश्र की डायरी के कुछ भाग. ये कड़ी आगे भी जारी रहेगी .
सोहर
पहलि पहर राती बितल सब लोग सुतल रे देवकी चलली नहाय कि दस सखी संग लागु रे
कियो सखी हाथ पैड माजथि कियो गगरी भरु रे
कियो ठार कदम तर नैना स नीर भरु रे
यशोमति हाथ पैर माजथि कौशल्या गगरी भरु रे देवकी ठाढ कदम तर नैना स नीर भरु रे
किये तोरा कन्त तुरन्त कयल किये दैव दुरि कयल रे
किये तोरे ठाढ कदम तर नैना स नीर बहु रे
सात पुत्र दैए देलनि कंस हरि लेलनि
आठम रहियऊ गर्भ स उनको नहिं भरोस थीक रे
चुप चुप रहु बहिन सहोदर अपन बालक हम भेजब आहांक जोइयायेब रे
2.
पान स धानि पातरि कुसुम सन सुन्दर रे
रतन सिंहासन पर बैसल दर्द व्याकुल रे
काहां गेली किये भेली नन्दी नन्दी दुलरइतीन
आनि दिय भईया बजाय दर्द व्याकुल रे
जुअवा खेलईत आहां भईया स विनती करू हे
भईया आहां धनि दर्द व्याकुल आहिं के बजावथि हे
एक देलनि एहरि पर दोसर देहरि पर रे
तेसरे में बैसल पलंग पर कहु धनि कुशल हे
एक कुशल पिया मन पारु ओ दिन मन पारु रे
बाबा देल पलंगिया ओही पर फ़ुसलाओल रे
एक कुशल धनि मन पारु रे
सेर सेर लड्डुआ खुआएलहु कियो नहिं जानल रे
आई धनि दर्द व्याकुल सब कियो जानल रे
3.
गाछ सुतल तोहे सुगना कि तोहु सीताराम कहु रे ललना रे
काहां रंगले दुनु होठ रतन सन सुन्दर रे
बाबा घर बाजन बाजे भईया घर बेटा भेल रे ललना रे ओतहीं रंगैलऊं दुनु होठ रतन सन सुन्दर रे
भोर भिनसाऎ भेल होरीला जनम लेले, बाजय लागल बधाई धरती आनन्द भेल रे
सास उठलि मंगल गावईत उठली नन्दी नचैत उठली रे ललना रे गोतनी उठली जरईत कि कंस जनम लेल रे
सुरदास सोहर गावोल गावि सुनावोल रे ललना रे तीन कहु बास बैकुण्ठ कि पुत्र फ़ल पाओल रे
4.
सुन्दरि चलली गंगादह रे आओर यमुना दह रे ललना रे गंगा अहुंके अरजिया गंगा डुबी मरब हे
किये तोरा आहे सुन्दरी सासु दुख किये नन्दी किये दुख रे ललना किये तोरा परदेश गंगा डुबी मरब रे
जानी कानु जनि खिजु सुन्दरि जनि नैना नीर ढारु रे
नहिं मोरा आहे गंगा सासु दुःख नहिं नन्दी दुःख रे नहिं मोरा पिया परदेश बालक दुःख डुबी मरु रे
जनि कानु जनि खिजु सुन्दरी जनि नैना नोर ढारु रे ललना रे गंगाजी होयती सहाय कि पुत्र फ़ल पाओल रे
5.
किये मोरा कागा रे बाब आओता किये मोरा भईया आओता रे कागवा कौने सगुन तोहे आयल कि बोलिया सोहावन रे
नये तोरा आहे धनि बाबा आओत नहिं धनि भैया आओत हे धनि होरिला सगुन ले अयलयुं बोलिया सोहावन रे
जौ मोरा आहे कागवा बाबा आओत आओर भईया आओत रे ललना तोहरो काटवा दुनु ठोर कि बोलिया सोहावन रे
जौ मोरा आहे आगा पिया आओता होरिला जनम लेत रे कागा सोना मॆढायब दुनु ठोर बोलिया सोहावन रे
सोहर
पहलि पहर राती बितल सब लोग सुतल रे देवकी चलली नहाय कि दस सखी संग लागु रे
कियो सखी हाथ पैड माजथि कियो गगरी भरु रे
कियो ठार कदम तर नैना स नीर भरु रे
यशोमति हाथ पैर माजथि कौशल्या गगरी भरु रे देवकी ठाढ कदम तर नैना स नीर भरु रे
किये तोरा कन्त तुरन्त कयल किये दैव दुरि कयल रे
किये तोरे ठाढ कदम तर नैना स नीर बहु रे
सात पुत्र दैए देलनि कंस हरि लेलनि
आठम रहियऊ गर्भ स उनको नहिं भरोस थीक रे
चुप चुप रहु बहिन सहोदर अपन बालक हम भेजब आहांक जोइयायेब रे
2.
पान स धानि पातरि कुसुम सन सुन्दर रे
रतन सिंहासन पर बैसल दर्द व्याकुल रे
काहां गेली किये भेली नन्दी नन्दी दुलरइतीन
आनि दिय भईया बजाय दर्द व्याकुल रे
जुअवा खेलईत आहां भईया स विनती करू हे
भईया आहां धनि दर्द व्याकुल आहिं के बजावथि हे
एक देलनि एहरि पर दोसर देहरि पर रे
तेसरे में बैसल पलंग पर कहु धनि कुशल हे
एक कुशल पिया मन पारु ओ दिन मन पारु रे
बाबा देल पलंगिया ओही पर फ़ुसलाओल रे
एक कुशल धनि मन पारु रे
सेर सेर लड्डुआ खुआएलहु कियो नहिं जानल रे
आई धनि दर्द व्याकुल सब कियो जानल रे
3.
गाछ सुतल तोहे सुगना कि तोहु सीताराम कहु रे ललना रे
काहां रंगले दुनु होठ रतन सन सुन्दर रे
बाबा घर बाजन बाजे भईया घर बेटा भेल रे ललना रे ओतहीं रंगैलऊं दुनु होठ रतन सन सुन्दर रे
भोर भिनसाऎ भेल होरीला जनम लेले, बाजय लागल बधाई धरती आनन्द भेल रे
सास उठलि मंगल गावईत उठली नन्दी नचैत उठली रे ललना रे गोतनी उठली जरईत कि कंस जनम लेल रे
सुरदास सोहर गावोल गावि सुनावोल रे ललना रे तीन कहु बास बैकुण्ठ कि पुत्र फ़ल पाओल रे
4.
सुन्दरि चलली गंगादह रे आओर यमुना दह रे ललना रे गंगा अहुंके अरजिया गंगा डुबी मरब हे
किये तोरा आहे सुन्दरी सासु दुख किये नन्दी किये दुख रे ललना किये तोरा परदेश गंगा डुबी मरब रे
जानी कानु जनि खिजु सुन्दरि जनि नैना नीर ढारु रे
नहिं मोरा आहे गंगा सासु दुःख नहिं नन्दी दुःख रे नहिं मोरा पिया परदेश बालक दुःख डुबी मरु रे
जनि कानु जनि खिजु सुन्दरी जनि नैना नोर ढारु रे ललना रे गंगाजी होयती सहाय कि पुत्र फ़ल पाओल रे
5.
किये मोरा कागा रे बाब आओता किये मोरा भईया आओता रे कागवा कौने सगुन तोहे आयल कि बोलिया सोहावन रे
नये तोरा आहे धनि बाबा आओत नहिं धनि भैया आओत हे धनि होरिला सगुन ले अयलयुं बोलिया सोहावन रे
जौ मोरा आहे कागवा बाबा आओत आओर भईया आओत रे ललना तोहरो काटवा दुनु ठोर कि बोलिया सोहावन रे
जौ मोरा आहे आगा पिया आओता होरिला जनम लेत रे कागा सोना मॆढायब दुनु ठोर बोलिया सोहावन रे
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